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Important announcement!

Hello,

how are you all?

I hope You all are doing great, It has been a long time since last time I posted anything on my blog, actually I am super busy nowadays because I am handling multiple tasks at a time , you may think that I am going to spoil my root but I can’t help I am not in mood to leave anything which is going on in my daily life, if we talk about my blog then I would love to inform you that since last 6 months I was confused to decide that I should continue my writing on free WordPress Blog or I should shift my blog to self-hosted WordPress, finally last week I purchased domain and web hosting, and since that day I am continuously working on the web designing that’s why I couldn’t post anything until I complete that task.

I am sorry for not being here for last few weeks but soon I will start posting on my new blog so please forgive me and keep supporting me because I need your support to start that blog from zero level.

Still, I haven’t posted anything there but please subscribe my new website so that you never miss my new post.

 

If anyone here is planning to start a self-hosted blog then feel free to contact me for any help or you can ask any query or doubt, I would love to answer.

Mail me at – shubhankarsharma428@gmail.com

Please don’t forget to follow my new blog –  http://shubhankarthinks.com

Note – after clicking this link you will have to go

Thanks again!

Lots of love!

 

कैसे हैं आप सभी लोग ?

आप सभी से क्षमा चाहता हूँ क्योंकि मैं लंबे समय से यहाँ अनुपस्थित था , दरअसल मैं अपने नए ब्लॉग को डिज़ाइन करने में व्यस्त हूँ मगर जल्द ही नए ब्लॉग पर पोस्ट करना शुरु करूँगा इसलिए कृपया आप सभी उस ब्लॉग को भी फॉलो कर लें ताकि आप मेरा कोई नया पोस्ट पढ़ने से वंचित ना रहें या फिर मुझे आपका ब्लॉग पढ़ने का मौका ना मिल पाए |

अगर आप भी सेल्फ होस्टेड ब्लॉग के बारे में सोच रहे हैं तो मैं आपको पूरी राय खुशी खुशी दूंगा ,आप अपनी राय कमेंट में बता सकते हैं |

बहुत बहुत धन्यवाद आप सभी का !

नमस्कार

Mail me at – shubhankarsharma428@gmail.com

Please don’t forget to follow my new blog –  http://shubhankarthinks.com 

 

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We are 500+ now ! IBA2017

Hey , How are you all?

follower

Hope you all are doing great, I just got notification from WP that my blog has been completed 500 followers believe me when I started blogging that time this number was just a dream but now this is for real because of your warm love and support.

Thanks for reading my blogs and giving me such motivational comments which always push me to write more and more, due to busy schedule, I am not writing regularly, but still I am trying to write at least one post on every weekend as well as I try to read maximum posts as much as possible but still I missed plenty numbers of good posts, I am really sorry if I missed your wonderful article/poetry, I hope soon I could start blogging on a regular basis.

And one more thing you can post your blog/post link in the comment box if you are beginner like me so that I could read your new blog.I would like to clarify a few points, I hope you will take it positively– .

1- I am sorry if I ever made any candid discussion with you or you faced unvarnished comment.

2- Please never play like, follow the game, please be honest to WordPress.

3- If you are liking 10-20 posts within a minute it means you are not reading any single post as well as you are hurting the emotions of a writer.

4- Please be honest to every writer/blogger, if you are ignoring someone’s mistakes, that means you are not giving him/her a chance to improve. Please try to keep the standards and integrity of literature.

5- At last, I am sorry!Please forgive me if I am being rude and moody.Ping me by giving a comment if I haven’t followed your blog (especially for new bloggers).

Keep supporting , Love you all .

Note – Guys I have been nominated my blog for #IBA2017 so they are asking for reader testimonials/comments so please don’t forget to give positive lovely honest reviews in the fb comment plugin (Please click on fb comment button and submit testimonial ).

 

.

Thanks for reading till the end .

लिबास 

Img credit- http://im.rediff.com/money/2013/nov/01india1.jpg

​तन ढ़कने के लिए या फिर लाज हया के लिए किसी कारीगर ने ये लिबास,

शाम ढ़लते बाजारों में बनावटी चकाचौंध में दुकानों पर सजे हैं ढ़ेरों लिबास !
कुछ कौड़ियों में बिक रहे हैं 

बड़े कीमती हैं कुछ लिबास,

कुछ सूती, कुछ मख़मली तो कुछ रेशमी धागों से बने हैं ये सब लिबास !

खैर ये नहीं थी कोई बात खास|

आज बात होगी नज़र – ऐ-जहाँ  की ,

इंसान के गुस्ताख़ आलम और बनावटी समां की !
ऐ ! आदम तेरी शेखियाँ इंसानियत के लिए ख़तरनाक हैं,

तेरी एक तरफा अदालत में वकील बनी नज़र की दलीलें दर्दनाक हैं |
कुछ सच्चाई के किस्से फरमाता हूँ,

जगज़ाहिर हक़ीक़त से आपको दोबारा रूबरू कराता  हूँ!

इन लिबासों में छिपा कोई करिश्मा है,

यक़ीन नहीं तो अपनी चश्मदीद आंखों से पूछ लो !

ये तुम्हारी आंखें चश्मदीद गवाह हैं ,

लिबासों की करतूतें उन्हें खूब अच्छे से पता हैं|
अच्छा देखो!

ये सड़क किनारे कौड़ियों के लिबास पहनकर इंसान भी दो कौड़ी का हो जाता है ,

वो ऊंची दुकान पर शीशे में कैद कीमती लिबास पहनकर शैतान भी फ़रिश्ता बन जाता है!

आँखों के इस तुग़लकी फ़ैसले के लिए क़सूरवार किसे ठहराऊं,

दोष दूँ लिबास को या नज़र – ए – जहाँ के बनावटी गुमान की करतूत बताऊँ!



वो  सुल्तान – ए – जहाँ भी आज ख़ुद पर अफ़सोस तो करता होगा ,

क्या नेक इरादों से उसने तिलस्मी चीज़ बनायी थी “इन्सां “!

लिबासों की क़ीमत ख़ूब बढ़ीं हैं ,

मेरी कारीगरी का मक़सद  “इंसानियत” अब है कहाँ?

जज़्बात , इरादों और जिंदादिली की कीमतें गिर गयी हैं बाज़ारों में!

बेशकीमती हो गया है ये दिखावटी लिबास|

बेशकीमती हो गया है ये दिखावटी लिबास||

शुभांकर 
© Confused Thoughts


शहरी गर्मी

​ये कविता उस स्थिति के बारे में लिखी गयी है|

जब किसी नौकरी की तलाश में कोई बेरोजगार नौजवान युवा गांव से शहर का रुख करता है तो गर्मी में उसका हाल कुछ ऐसा हो जाता है-

IMG credit- https://commons.wikimedia.org/wiki/File:A_view_of_Road_Traffic_Chandagaur_to_New_Delhi_India_Highways.jpg


गर्म मौसम और शहर का तापमान स्तर,

यहां होता है माहौल औरों से इतर!

लू के थपेड़ों से जलता बदन,

काल के गाल में समा जाती है

वो मदमस्त पवन !

वो सड़कों से उड़ती तेज  धूल ,

जैसे

कोई चुभा रहा कोई गर्म शूल!

आँखें पथरा गयी हैं 

मंजिल की तलब में ,

सब जगह घूम रहा हूँ 

मैं बेमतलब में!

प्यास के मारे गला सूख गया है,

पानी का ना कोई अता पता है!

प्रदूषण की कालिख चेहरे पे लग रही है,

आज आसमान से भी मानो आग बरस रही है!

जहाँ नीम पीपल के वृक्ष थे,

वहां अब मकान खड़े हैं !



जो 2-4 पेड़ भाग्यवश बच गए थे ,

आज वो भी बिल्कुल शांत खड़े हैं!

कुछ कीकड के पेड़ बेज़ार खड़े हैं,

लोग तो उसकी बनावटी छाँव में भी लगातार खड़े हैं!

आँखें टोह रहीं हैं मंजिल की तलाश,

सुबह से नहीं मिला सही दिशा में निकास!

राहों की पहेली उलझती जा रही है,

हर एक गली के बाद एक जैसी गली आ रही है|

ऐसे भटकते भटकते सुबह से हो गयी है अब शाम ,

शाम को भी नहीं मिल पाता वो गांव जैसा आराम!

सुबह होते ही फिर वही रफ्तार भरनी है मुझे,

इस शहरी जिंदगी ने उलझा लिया है मुझे!

धूप में पिघलती सड़कों से दोस्ती कर ली है मैंने,

शहरी गर्मी की आदत डाल ली है मैंने|

©Confused Thoughts

ऑनर किलिंग!

​ऑनर किलिंग की घटनाएं हमारे देश में आये दिन होती रहती हैं, जिसके बाद के दृश्य को मैंने अपनी कविता के माध्यम से प्रदर्शित किया है|

यह कविता लड़की के बाप के ऊपर आधारित है ,जिसमें लड़की का बाप अपनी बेटी सहित उस लड़के की हत्या कर देता है |

आरोप सिद्ध होने के बाद उसे जेल होते है और घर वापस आकर कुछ इस तरह से व्यथित होता है –

होती अगर जीवित वो आज,

तो आँगन में मेरे भी चहचाहट करती वो !

इस गांव में ना सही कहीं दूर दूसरे शहर में रह लेती,

कम से कम इसी दुनिया में तो रहती वो |

प्यार किया था या कोई गुनाह किया था,

खुद अपने हाथों से मार दिया मैंने,

अपनी लाड़ली बेटी को|
ये समाज , धर्म-जाति सब कुछ दिखावे में आता है,

ना धन है मेरे पास ना कोई रोजी रोटी का अता पता है!
उस दिन मुझे उकसाने को हजारों का महकमा खड़ा था,

मेरी अक्ल पर ना जाने क्या पत्थर पड़ा था!
अपने घर की रोशनी को अंधेर में बदल दिया,

साथ में किसी दूसरे के घर के चिराग को भी दुनिया से ओझल कर दिया |
क्या पाया मैंने?
अपने घर की हँसती खेलती हस्ती को मिटा दिया ,

साथ में किसी दूसरे के घर में भी मातम बिछा दिया|
पड़ौसी,कौम,कुछ गांव वाले!

ये लोग कौन से दूध के धुले थे,

इनके चिट्ठे पिटारे सब खुले हुए थे!

मति मारी गयी थी मेरी उस रात,

सुलह करके भी हो बन सकती थी बात|
हाँ!मेरी जाति का नहीं था वो ,

मगर हांड,माँस, खून से बना , 

मेरी ही तरह इंसान था वो!
मेरी ही तरह रोटी,सब्जी खाता था,

किसी दूसरे ग्रह का प्राणि नहीं था वो!
समाज में प्रतिष्ठा की ही तो बात थी,

या फिर सब लोकलाज के डर की करामात थी!

मगर आज तो नहीं कोई सम्मान मेरा ,

उड़नछू हो गया सब मायावी गुमान मेरा!
याद करता हूँ तो समझ आता है ,

ना प्रतिष्ठा में दम था , 

ना मेरे कर्मो में कोई खास बात थी!

समय वो था जब मेरे ऊपर लक्ष्मी की बरसात थी|

आज निर्धनता और घर अकाल पड़ा है,

मेरे पास ना  कोई सगा सम्बन्धी, ना दोस्त बंधु खड़ा है!

अपनी हरी भरी बगिया को अपने हाथों उजाड़ दिया मैंने,

कुदरत के बनाये अनोखे खेल को अपनी दिखावट में बिगाड़ दिया मैंने!

इस समाज, धर्म के मुद्दे सब निपटा ही लेता मैं,

कल मुमकिन नहीं था मगर आज उसे अपना ही लेता मैं!

मेरे घर नहीं तो किसी दूर शहर में वो होती,

मेरे दिल में खुशी और मन को तसल्ली होती|


©Confused Thoughts
कैसे हैं आप सभी लोग?

कमेंट में बताना ना भूलें !

आपसे क्षमा चाहूँगा इतने दिनों से गायब था और आगे भी गायब रहूँगा उसके लिए अतिरिक्त क्षमा चाहता हूँ|

कॉलेज , कोचिंग, एग्जाम सारे बहाने अब खत्म हो चुके हैं इसलिए इस बार कोई बहाना नहीं बता रहा |

हिंसक-अहिंसा

अभी जैसा आप सबको पता है देश में एक गंभीर समस्या चल रही है , उस समस्या का अभी तक कोई समाधान नही मिल पा रहा

रोज हम अखबारों में सैनिकों के शहीद होने की खबर पढ़ते हैं ऐसी खबर पढ़कर मेरे अंदर बहुत उथल पुथल होती है समझ नहीं आ रहा आखिर ये रुकने का नाम क्यों नहीं ले रहा उसी व्यथा को मैंने कुछ शब्दों के माध्यम से लिखा है शायद कुछ लोगों को आपत्ति भी हो मेरे शब्दों पर मगर क्षमा चाहूँगा स्पष्टवादी हूँ –



बड़े शौक से लोग पढ़ते हैं और नसीहत देते हैं 

शांतिप्रियता मनुष्यता का प्रमाण है !

ऐसे शांति पक्षधरों को आज स्पष्ट शब्दों में बोलूंगा 

राजनीति , कूटनीति , इतिहास सारे पन्ने खोलूंगा !
खैर राजनीति तो कल परसों की कहानी है 

मगर सिंधु घाटी की ये सभ्यता तो वर्षों पुरानी है 

जब जब शांति की शरण में कोई गया था

तब तब उसकी उसकी हस्ती को शत्रु निगल कर गया था!

एक बार गौर करो इतिहास पर ऐसी अनेकों कहानी हैं !

तुम खोलो तो सही महाभारत  का विवरण

वो पांडवों के शांति प्रस्ताव का प्रकरण 

दुर्योधन समस्त राज हथियाने चला था 

भगवान कृष्ण को भी बंदी बनाने चला था !



इतिहास पढो तुम चक्रवर्ती सम्राट का 

जो खेल खेलता था शत्रुओं के विनाश का 

सुदूर देश की क्या मजाल जो आँख उठाकर भारत की तरफ देख सके 

किसी के क़दमों में साहस नहीं था जो सीमा में घुस सके 

किंतु अंत किसी ने ना जाना 

जब अशोक ने शांति का दामन थामा 

मगर परिणाम देखकर आपको होगा अचरज 

गृहयुद्ध , क्षीणता , अधिपत्य और कमजोर वंशज 

फिर ना बना सका कोई एक क्षत्र शासक !

शांति के दूतों का जब हुआ था भारतवर्ष में आगमन 

तब हमें क्या मिला ?

600 वर्षों तक मुगल अत्याचार फिर २०० वर्षों तक अंग्रेजी गुलामी का शासन!

मुझे नहीं पता आप हिंसक हो या फिर अहिंसावादी हो 

या फिर मेरी तरह विचारवादी हो 

मगर कैसे भुला सकते हो नेहरू और गाँधी को 

मैं बहस बिल्कुल नहीं करूंगा स्वतंत्रता दिलाने में योगदान किसका अधिक था !



मगर ये जरूर है 

अहिंसा का प्रयोग उस समय 

मौलिक से ज्यादा भौतिक था !

तब अहिंसा अगर कुछ दिन चुपचाप गहरी नींद सोती 

तब भारत में इतनी ना हिंसा होती 

और आज की स्थिति ना इतनी  गंभीर होती !

वहां सीमा पर देश का जवान शहीद होता है 

और वो राजनीतिक महकमा चैन की नींद सीता है 

कभी सीमा पर कभी सीमा के भीतर रोज मर रहे हैं हम 

पड़ौसी मुल्क से तो क्या निपटेंगे 

खुद अपने ही देश में जाने किससे डर रहे हैं हम ?

शस्त्र , सेना , गोला बारूद का भंडार है 

माँ भारती की कृपा से धन धान्य भी अपार है 

उसके बावजूद भी शत्रु रोज घर में घुसकर घुसपैठ कर रहे हैं 

हम अभी भी ना जाने किस घड़ी का इंतजार कर रहे हैं !

मैं शांतिप्रिय छवि अब उतारने को बोलूंगा 

हिंसक बनकर दहाड़ने को बोलूंगा !



©Confused Thoughts


 

If you want to listen audio poems you can visit our    YouTube Channel even you can also contribute your voice to our channel .

for more detail mail us-  kalaravgujan@gmail.com

 

मेरे अंतर्मन का बेनाम नगर

​वो मेरे अंतर्मन के बेनाम नगर में 

अमुक स्थान से निकलती संकरी राहों से गुजरने के बाद 

एक आवास श्रेणी है !

वहां कोई अज्ञात लोगों का पूरा समूह छिपा है ,

हाँ!एक दो नहीं हैं ,उनका तो पूरा झुंड है पूरा का पूरा !

शान्ति से रहें तो भी ठीक है ,

मगर वो अशिष्ट जन कोलाहल करते हैं

मैं ठहरा लाचार , निर्बल उनके सामने ,

आखिर अकेला प्राणी पूरे झुंड से कैसे लड़ाई करेगा!

वैसे एक नहीं हैं वो लोग 

मगर अच्छा होता अगर वो समूह में एक होते 

विचारधाराएं, परिकल्पनाएं , मार्ग, अभिलाषाएं सब एक होते 

मस्तिष्क – नगर में जाने के मार्ग ना अनेक होते !

दुर्भाग्य कहूँ या फिर मन की पिपासा

हाँ! सारी त्रुटियां मन ने ही तो की हैं ,

क्या जरूरत थी अंतर्मन – आवास श्रेणी में इतने रिक्त स्थान बनाने की ?

अब देख लो अज्ञात लोग अवैध कब्जा करके काल सर्प की भांति कुंडली मार के बैठे हैं !

फिर मैं विचार करता हूँ 

अच्छा ही तो है , जो यहां अनेकों रहते हैं 

वरना इतने बड़े रिक्तस्थान पर कोई

विशाल , वीरान , भुतहा खण्डहर होता !

जिन्न, छलावा और राक्षस ये सब यहां घर कर लेते 

उनके दुष्प्रभाव से शायद मैं भी कोई दानव होता !

अब मन पर प्रश्न चिन्ह लगाना छोटे मुंह बड़ी बात हो गयी

मेरा कद ही क्या है उसके सामने ?

शायद आपको नहीं पता होगा !

मैं भी तो उसी दुर्गम श्रेणी के एक आवास में रहता हूँ

शांत, एकदम अचल , द्वंद्वपूर्ण  विचारों से आच्छादित और असहाय

हाँ यही विशेषताएं उपयुक्त हैं मेरे लिए  !

हाँ एक बात है 

अपने ग्रह में स्थायी रूप से निवास करता हूँ

अब इसे आप मेरी हठवादिता कहो या फिर जुझारूपन 

या फिर आश्रित हूँ मैं 

मगर इन अज्ञात प्राणियों का क्या है ?

अस्थिरता इनके स्वभाव में है 

आज कोई यहां से जाता है तो कल दूसरा कोई रहने आ जाता है !

अनेकों विचार -धाराओं के चलते ये उद्दंडी झुंड कोलाहल बहुत करता है !



नमस्कार दोस्तों ,

जैसा कि आपने नोटिस भी किया होगा पहले के मुकाबले मेरी पोस्ट्स अब नहीं आ रहीं हैं , उसके लिए क्षमा चाहूँगा मुझे भी कुछ समझ नहीं आता आखिर क्यों ?

ऐसा नहीं है राइटिंग का मन नहीं करता !करता है मगर 24 घंटे से ज्यादा मेरे पास भी नहीं हैं सब कुछ करना चाहता हूं एक तरफ सोचता हूँ कुछ भी छूट ना जाये , ये भी कर लूं वो भी कर लूं 

मगर एक तरफ मन कहता है ये सब व्यर्थ की मोह माया है , शांति से रहो मगर फिर भी अंतर्मन अनेकों रूप धारण करके मुझे लगातार भ्रमित करता है कुछ ऐसी व्यथा को मैंने समय निकालकर लिखा है अगर आपको ये द्वंद अपना से लगता है तो विचार अवश्य देना !

धन्यवाद

©Confused Thoughts

आत्मविश्वास 

बहुत बार जीवन में लगातार असफलताएं मिलती हैं और हम इतने हतोत्साहित हो जाते हैं कि समझ नहीं पाते आखिर अब करना क्या है !

नकारात्मकता हम पर हावी होने लगती है ऐसे में किसी की कोई बात समझ नहीं आती फिर भी हमारे पास खुद को उत्साहित करने का मौका होता है जिससे हम काफी हद तक नियंत्रण पा सकते हैं वो है आत्मविश्वास !

कुछ ऐसे ही उद्देश्य से मैंने ये कविता लिखी है इसलिए शीर्षक देखकर भ्रमित नहीं होना—-

निराशा , हताशा कृष्ण मेघ के समान 

परिधि में आच्छादित करेंगी,

उपहास तिरस्कार और लोक लाज सब व्यर्थ में 

उलझाकर विचारों में कल्पित   करेंगी

 मगर वीर! तुम बढ़े चलो 

इतिहास नया तुम गढ़े चलो !

ये समस्त विश्व एक जंजाल है 

यहां दानव शक्तियां विकराल हैं 

क्योंकि घोर कलियुग का ये काल है !

वीर!तुम निष्ठावान बनो, तुम धैर्यवान बनो 

वीर !तुम सत्यवादी बनो , तुम आशावादी बनो !
ये समस्त मनुज कंगाल हैं 

अज्ञान के बेताल हैं मगर 

तुमको कोई भ्रमित करे ,

भला क्या किसी की मजाल है?

मार्ग में बाधा सहस्रों खड़ी हैं 

जाने कितनी कंटक बबूल पड़ी हैं ,

हृदय को बना लो 

अभी ना जाने कितनी विफलताएं प्रतीक्षा में खड़ी हैं !

वीर ! तुम भयभीत मत हो 

विपदा से अधीर मत हो ,

तुम दृढ़ और निर्भीक बनो 

रण योद्धा जैसे अजीत बनो !
तुम ज्ञान का कृपाण लो 

इसे परिश्रम से तुम धार दो ,

असफलता रूपी विशाल वृक्ष का

जड़ तना सब काट दो !
वीर !तुम रुको नहीं ,वीर तुम झुको नहीं !
राष्ट्र के नव चिराग हो तुम

तुम्हारे हस्तों में इसकी बागडोर है ,

एक क्षण भी ना भ्रमित रहो 

नकारात्मकता चारों ओर है !

तुम गंगा की तरह बनो 

सतत् शीतल और निर्मल रहो,

राष्ट्र हित के कार्यों में सदा चलायमान रहो 
वीर! तुम बढ़े चलो 

सुमार्ग पर बढ़े चलो !
© Confused Thoughts

अंतिम दृश्य भाग -९

एक बड़ी सी कॉलोनी के बाहर लम्बा सा लोहे का जालीदार दरवाजा है और उसपे बैठे हुए दो बीमार से चौकीदार उनकी शायद शक्ल ही ऐसी है बेचारे सुबह से शाम तक गाड़ियों के नम्बर नोट करते हैं कभी कोई रुकता नहीं तो गाड़ी के पीछे उड़ती धुल भी खा लेते हैं ,क्या करें नौकरी है साहब महीने के अंत में दस हजार रूपये मिलेंगे तब जाकर घर के पांच सदस्यों के लिए रोटी का इंतजाम होता है !

खैर मैं भी क्या गेट पर ही अटक गया 😁😁 चलो आगे बढ़ते हैं एक गली कट रही है गेट से सीधे १०० मीटर चलने के बाद साथ में गली के बगल में एक छोटा सा पार्क है जिसमें २०-२५ छोटे बड़े बच्चे खेल रहे हैं यही कोई 6-7 बड़े लड़के वॉलीबॉल खेल रहे हैं

बाकि 2-3 बेचारे खड़े देख रहे हैं दरअसल बात यह है कि मन तो उनका भी बहुत है खेलने का मगर उनकी उम्र उनके आड़े आ रही है सारे लड़के उन्हें छोटू बोलकर खेल देखने को बोल देते हैं कभी कोई मौका ही नहीं देता अब इन पागलों को कौन समझाए क्रिकेट की पिच पर 17 साल का सचिन २९साल के बॉलर की तेज गेंद पर छक्का मारने में देर नहीं लगाता था !

खैर छोड़िये वो देखिये वहां पार्क के दूसरे कोने पर कुछ सीट्स लगी हैं जिनमे से एक सीट पर शक्तिप्रसाद भी बैठे हैं और निहार रहे हैं आसमान में जाती हुई पंछियों की कतारों को , शाम होते ही गलगल कबूतर कतार में घर वापसी करते हैं तो पूरे गांव में उनका कोलाहल साफ़ सुनाई देता है

मगर यहां तो शहर में वाहनों का इतना भीषण शोर है कि किसी पक्षी की आवाज तक सुनाई नहीं देती , शक्ति प्रसाद देख ही रहे थे तभी पीछे से एक आवाज आई 

“पिताजी घर चलिए खाना तैयार है ” ये आवाज थी सुधीर की वो अब ऑफिस से वापस आ गया था और आने के बाद सीधे पार्क की तरफ तेजी से आया है 

आज शहर आये चार महीने गुजर गए थे शक्तिप्रसाद को शायद एक एक दिन का हिसाब किताब मालूम होगा मगर वो कभी जाहिर नहीं होने देते थे हाँ दिनचर्या आज भी वही पुरानी वाली थी तभी तो 6 बजे खाना लग गया था उनके लिए क्योंकि सबको पता है सूर्यास्त के बाद शक्तिप्रसाद अन्न ग्रहण नहीं करते हैं , सारा परिवार ९बजे खायेगा मगर पिताजी का खाना शाम को ही लग जाता है वैसे भी खाना खाने के बाद उन्हें टहलने जाना होता है उसके बाद वो ९बजे तक सो भी जाते हैं !

टीवी देखने का उन्हें शौक है नहीं , बहु सारा दिन कहती है पिताजी आप टीवी देख लिया करो सारा दिन कैसे व्यतीत होगा , अब जिस व्यक्ति ने पूरा जीवन गांव , खेत, खड़ंजे , मेड़ पर घूमते हुए या फिर काम करते हुए निकाल दिया हो वो खाली बैठकर टीवी से मोह कहाँ करेगा मगर अब ये उनकी मजबूरी जरूर है कि आज ज़िन्दगी पुरे बड़े गांव से लेकर एक छोटे से 14×14 के कमरे में सिमट कर रह गयी है !घर में कुल तीन कमरे हैं,दो बड़े कमरे एक छोटा (गेस्ट रूम) एक में सुधीर और उसकी पत्नी , दूसरे बड़े कमरे में बच्चे , अब बच्चों को भी तो पढाई के लिए एकांत चाहिए !

शाम को ४-५ बजे शक्तिप्रसाद पार्क की तरफ निकल जाते हैं वहां कुछ और भी बूढ़े बुजुर्ग आते हैं जिनमें अधिकतर सरकारी सेवानिवृत्त हैं तो उनकी बातें भी पेंशन , देश विदेश , राजनीती वाली होती हैं शक्तिप्रसाद बेचारे इन सबसे कभी मुखतिब नहीं हुए हैं तो वो बस चुपचाप सुन लेते हैं , हाँ कभी शहर की समस्या वगरह की बातें होती हैं तो वो भी एक दो बातें बता दिया करते हैं क्योंकि गांव की एक एक समस्या पर उनका ध्यान रहता था सबकी फ़रियाद वो सुनते थे

बस यही दिनचर्या थी हाँ सुबह चार बजे उठने वाली बात बतानी तो मैं भूल ही गया , आज भी चार बजे उठना और नहा धोकर साफ़ स्वच्छ वस्त्र पहनकर वो पास के ही शिवमंदिर पर जाते थे आखिर पक्के शिवभक्त जो ठहरे बिना दर्शन किये उनसे कहाँ रहा जाता था वो बात अलग थी की गांव में कुछ दिन अपने भगवान् से रुष्ट हो गए थे मगर इसमें हम कुछ कह भी नहीं सकते ये भगवान् और भक्त के बीच का मामला है !

७बजे दोनों बच्चे घर से निकल जाते हैं और ८बजे सुधीर ऑफिस चला जाता है अब घर पर रह जाते हैं सिर्फ दो प्राणी ससुर और बहू , बहू के पास तो बहुत सारे काम होते हैं जैसे कपडे धोना , ढेर सारे गंदे बर्तन और झाड़ू पोछा ना जाने क्या क्या !

मगर शक्तिप्रसाद बेचारे क्या करें ?

उनके लिए तो यहां कोई काम ही नहीं बचता हाँ कुछ दिनों से जिद्द करके वो सब्जी लेने निकल जाते हैं मगर सब्जी तो शाम को आती है सारा दिन कैसे व्यतीत करें , कोई इंसान सारा दिन सो भी तो नहीं सकता

वो भी ऐसा इंसान जिसे खेत में फावड़ा चलाये बिना खाना तक हजम नहीं होता था और शाम को दो चार दांव पेंच चलाये बिना रात को सुकून की नींद नहीं आती थी  मगर ज़िन्दगी है साहब हम सब तो सिर्फ कठपुतली हैं ऊपर वाले की , सारा खेल तो वो ही खिलाता है !

शक्तिप्रसाद को कोई काम इसलिए भी नहीं करने दिया जाता की कहीं पडोसी बोले की बुजुर्गों से काम करा रहा है 

बेटा जवान है और बाप काम कर रहा है वैसे  शहर में ऐसा कोई ख़ास काम होता भी कहाँ है वही खाना बनाना और खा लेना इससे ज्यादा घर पर कोई काम नहीं होता 

और जो भी हो रहा है उसपर हम कुछ कह भी नहीं सकते सब कुछ विधि है साहब विधान ऊपर से लिखकर आता है !

 आगे पढ़ें …….
©Confused Thoughts 

अगर आप अंत तक पढ़ रहे हैं तो आपको मेरा बहुत बहुत धन्यवाद  साथ ही साथ अपने विचार देना न भूलें 

पिछले भाग के बाद ये भाग काफी दिनों बाद प्रकाशित हुआ है इसके लिए क्षमा चाहूँगा कुछ आवश्यक कारणों से मुझे देरी हो जाती है 

धन्यवाद