Category Archives: Kavita

व्यंग:- आखिर दोषी कौन है?

आज विजययदशमी के मौके पर ,

एक व्यंग मेरे दिमाग में अनायास चल रहा है!

पुतला शायद रावण का फूंका जायेगा,

मगर मेरे अंतःकरण में एक रावण जल रहा है|

तर्क-कुतर्क व्यापक हुआ है, हठी, मूढ़ी भी बुद्धिजीवी बना है!

आज दशहरा के मौके पर कोई सीता पक्ष तो,

कोई रावण पक्ष की पैरवी में लगा है|

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आगे पढ़ें…….

 

आप सभी को विजयदशी की हार्दिक शुभकामनायें,

आपको मेरी कविता अच्छी लगी है तो कमेंट करके अपनी प्रतिक्रियाएं अवश्य दें|

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Discussion

Hey Guys I don’t know what’s wrong with WordPress, I am reading and commenting on your posts and I think, automatically all of my comments are listed as spam so please check your spam folder ,it’s my  request to all who got my likes on their posts because I always try to make comment on every post.

सुप्रभात,
              नमस्कार दोस्तों ,कैसे हैं आप सभी लोग ?
आज मैं आपसे दो चार जरूरी बातें करने के लिए आया हूँ , तो शुरू करता हूँ –
१- मेरी नई कविता ब्लॉग पर पब्लिश हो गयी है ,आप दिए गए लिंक पर जाकर कविता पढ़ें और वापस यहां बताएं आपको कविता कैसी लगी ?
२- ये बात है आपको होने वाली असुविधा की क्योंकि मेरे नए ब्लॉग पर कमेंट का ऑप्शन वर्डप्रेस मोबाइल एप्प यूज़र्स के लिए नहीं आ रहा , मैंने इसको साल्व करने की कोशिश में दो दिन निकाल दिए मगर कोई भी सोलुशन नहीं मिला, आप लोग मोबाइल से भी कॉमेंट कर सकते हैं अगर आप मोबाइल एप्प से ना खोलकर वेब ब्राउज़र से ये लिंक खोलेंगे तब !
३- तीसरी बात ये है कि , पिछले दो दिन से मैं बहुत सारे लोगों के ब्लॉग पढ़ रहा हूँ और कमेंट भी कर रहा हूँ मगर मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरे ज्यादातर कमेंट वर्डप्रेस स्पैम बॉक्स में भेज रहा है, आप सभी से मेरा अनुरोध है कृपया एक बार कमेंट बॉक्स चेक कर लें !
इन्हीं सब बातों के लिए मैंने ये पोस्ट लिखी थी ,
आप सभी को दुर्गा अष्टमी की बहुत सारी शुभकामनाएं
धन्यवाद!

चिंगारी उठी कोई ,जल उठा शहर मेरा!

​चिंगारी उठी कोई फिर ,

छिट पुट सी बातों में जलने लगा शहर मेरा !

ना होश है उन्हें अपनों का , 

ना रहा कोई तेरा मेरा |


किसी ने बीच में जाकर सभी से प्रश्न ये पूछा ?

“क्या यही सिखलाता है मजहब – धर्म तेरा ?”


मचलकर लोग गुस्से में तुनक कर गुमान से बोले 

“ये शुरुआत थी अभी तक कि , हम पूरा जहाँ जला देंगे !”

Jla do

बड़ा विचलित हुआ वो सुनकर फिर भयभीत से कठोर स्वर में बोला –



” ये लो माचिस और ये ईंधन भी ,

जला दो अब ये शहर सारा!

ये घर सारे जला देना,

जला देना वो चौराहा !


वाहन भी जला दो तुम,

दुकानें भी जला देना !

किसी के आशियाने उजाड़ दो तुम,

किसी की रोजगारी जला देना |



जला दो वो शिला लेख सारे,

जिसमें इंसानियत का सबब हो!

जला दो वो तहज़ीब विरासत भी,

जिसमें आदाब-ओ – अदब हो |



वतन परस्ती की इबादतें भी ,

कानूनी हिसाब तुम जला देना !

मानवता सिखाने वाली,

किताबें तुम जला देना|


जलाकर राख कर दो तुम ,

मेरे देशी अरमानों को !

रहे बाकी कुछ जलाने को,

तुम मुझको भी जला देना |



बनेगी राख जब इन सबकी ,

हवा में मिलावटें होंगी!

तुम्हारे इन साफ चेहरों पर ,

कल जब कलिखें होंगी !


भले ही दर्ज ना हो तुमपर कोई आपत्ति अदालत में ,

मगर ऊपर वाले की अदालत में सुनवाईयाँ जरूर होंगी |”


वो खरा इंसान अभी इतना ही बोल पाया ,

उसकी तिरस्कारपूर्ण बातें सुनकर एक चतुर प्राणी चकराया !

पूरे माजरे को समझने में उसने एक मिनट ना लगाया!

फिर भीड़ को चीरकर वो जोरों से चिल्लाया –


ये प्रवचन नहीं दे रहा भक्तों , कर रहा ये हमारी कठोर निन्दा है !

ये पक्का कोई कांग्रेसी है या फिर बीजेपी का कोई नया एजेंडा है|”

इतने सुनने भर की देरी थी बस,

उठी लाठी चली कृपाण तन कर,

फिर टूट पड़े सब उस सज्जन पर!


चिंगारी उठी कोई,

फिर जल उठा शहर सारा|


© ConfusedThoughts

– Shubhankar

Do listen the audio version of this poem.

सपने क्या होते हैं?

​सपने क्या होते हैं?

अगर शाम ढले बेफ़िक्र होकर ,

लजीज़ खाना खाकर,

पंखा कूलर या फिर ऐसी की ठंडी हवा में ,

मख़मली से आराम गद्दों पर,

बड़े चैन की नींद सो जाते हो आप!

तो क्या खाक सपने देखोगे आप?


सपने वो होते हैं जो रातों की नींदें उड़ा दें,

चैन सुकून को तुम्हारा दुश्मन बता दें,

और इस शांत से दिमाग में कोलाहल मचा दें|



सपने वो नहीं जिन्हें सुबह आंखें खुलते ही भूल जाओ,

सपने वो हैं जिन्हें रात को आंखें मूँदने के बाद भी ना भूल पाओ!

Pic credit – https://pixabay.com/photo-2037255/


सपने वो नहीं जिसमें ऐश- ओ -आराम हो,

मस्त सी जिंदगी चले परेशानी का कोई नाम ना हो !

सपने वो हैं जिसमें आराम हराम हो,

तुम इन रफ्तार रोकने वाली रातों से भी परेशान हो|



वो सपने भी क्या सपने हुए?

जो बड़ी आसानी से मिल जाएं,

करना कुछ भी पड़े नहीं और सब कुछ बना बनाया मिल जाये !

सपने तो वो हैं जो पग पग पर तुम्हें सताएं,

चुनौतियों से तुम्हें और मजबूत बनाएं|



सपने देखो मगर देखभाल के देखो,

कुछ अपने भीतर खंगाल के देखो!

फिर मिल जायेंगे वो सपने तुम्हें भी,

जो आंखों से तुम्हारी नींदें छीन लेंगे|



© Confused Thoughts

– Shubhankar

कैसे हो आप सभी लोग ?

अब ब्लॉग पर आना काफी कम हो गया है मेरा फिर भी मेरी कोशिश रहती है कि आप सभी के पोस्ट ज्यादा से ज्यादा पढूँ , अगर फिर भी भूलवश कोई ब्लॉग छूट जाता है तो आप कमेंट में मुझे याद दिला सकते हैं ताकि मैं आपकी मूल्यवान रचनाएं पढ़ने से वंचित ना रह जाऊं!

धन्यवाद !

नमस्कार,प्रणाम !

 

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा !

​विस्फोटकों के डर से,

सेना हटती नहीं हमारी!

Indian Bloggers

अरि दल की  साजिशों से ,

गति रुकती नहीं हमारी!

अवशेष ,संस्कृति से ,

दृष्टि हटती नहीं हमारी !

अपवाद बंदिशों से ,

छवि डिगती नहीं हमारी !

कुछ खास है हममें ,

की हस्ती मिटती नहीं हमारी !

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ||



आदर्श देख इसके 

लोग सुदूर से आते हैं ,

विचार देख इसके,

चकित रह जाते हैं!

सत्कार देख यहां का,

वो यहीं  बस जाते हैं !

आलोचकों के इरादे सब ,

धरे के धरे रह जाते हैं ||



कोशिश हजार कर लो ,

बंदिश लगा के धर लो !

कसमें लगा लो जितनी ,

ताकत लगा लो जितनी !

मुँह एक साथ खोलेंगे ,

फिर एक स्वर में बोलेंगे –

“आसानी से मिटा दोगे,

हस्ती इतनी छोटी नहीं हमारी !

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा” ||



कितने भी जाति , धर्म 

और प्रान्त बना लो ,

छल-प्रपंच सारे तुम लगा लो !

सब अपने अपने गुट बना लो ,

फिर सज्जनों में फूट डालो!

चाहे धर्म की तुम लड़ाईयां लड़ा लो ,

फिर हवाओं में जादू डोलेगा,

देशप्रेम का अमृत घोलेगा !

हर युवा शान से बोलेगा –

“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा” ||



स्वतंत्रता के रंग में,

ध्वज देख कर गगन में !

सीना  गर्व से चौड़ता है ,

रक्तचाप तेजी से दौड़ता है!

रेशे चढ़ जाते हैं मेरे ,

कलाइयों और हाथों के!

ह्रदय तेज से धड़कता है,

हर एक अंग फडकता !

और मन कामनाओं में डूबा

की यहाँ जन्म हो दोबारा ,

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ||



भूतल  के  अंक में  ,

गढ़ा है तिरंगा प्यारा !

समतल से प्रांगण में ,

रहे स्वाभिमान हमारा !

उन्नति के प्रयास हों ,

ये ध्येय रहे हमारा !

हस्ती यूं हीं जीवित रहे ,

उद्देश्य ये हमारा !

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ||

जय हिंद, जय भारत !


आप मेरी इस कविता को मेरी आवाज में सुनना ना भूलें 

लिंक



©Confused Thoughts

शुभांकर

ये थोड़ा बेवकूफाना है मगर आप अपने विचार इस लिंक पर दे सकते हैं 😀

बातों को बातों में ही रहने दो !

​आशियाना किसको नहीं भाता ?सबको भाता है ,

तुम्हें नए नए आशियाने भाते हैं ,

और मुझे अच्छे लगते हैं  पुराने मकान!
तुम हर्षोल्लास के साथ नये नये स्थानों पर रहो,

मेरा क्या?मैं ठहरा हठी !

मुझे तुम उसी पुराने मकान में रहने दो !

वो अठखेलियाँ,वार्तालाप सब भूतकाल की बातें हैं ,

अब उन सब बातों को सिर्फ बातें ही रहने दो |

हिंदी चलचित्र पटकथा के समान तुम्हारे इस प्रेम प्रसंग में,

प्रेमी नायक का किरदार मैं नहीं निभा सकता !

हाँ! वो बात अलग है कि नायिका के लिए उपयुक्त पात्र तो तुम भी नहीं थीं!

मगर ये सब बातें हैं इन्हें बातों में रहने दो|

विशिष्ट सुरक्षा घेरे में घिरे तुम्हारे क़ैद मन मस्तिष्क का,

भला कैसे में गहन अध्ययन कर पाता ?

तुम्हें तो लगता है , जैसे मेरे पास कोई दिव्य शक्ति है विचारों को पढ़ने की !

अगर शक्ति होती तो मैं साधारण मनुज कहाँ कहलाता ?

खैर ये सब बातें हैं अब इन्हें बातें ही रहने दो |

तुम हो कोई प्रख्यात सुकुमारी जैसी,

तुम रहो आरामदायक , वातगामी अपने नये नये घरों में !

मैं हूँ युद्ध में सब कुछ हार चुके राजा के जैसा ,

मुझे पीड़ानाशक वनवास में सिर झुकाकर अकेले रहने दो !
स्वप्नों की आकांक्षाएं और प्रेम पिपासा!

 ये सब सिर्फ बातें थीं अब उन्हें बातों में ही रहने दो |

Pic credit- https://images.vice.com/vice/images/articles/meta/2015/04/08/i-was-assaulted-on-the-street-but-i-still-walk-home-alone-at-night-408-1428519902.jpg

शुभांकर 

© Confused Thoughts

आप सभी लोगों के अपार स्नेह और उत्साहवर्धन के चलते में व्यस्ततम दिनचर्या से थोड़ा समय लिखने के लिए निकाल पाया हूं ,आशा है आप अपने विचार जरूर देना चाहेंगे !

धन्यावाद!


कच्चे मकान!

​दशक डेढ़ दशकों में कुछ बदलाव मेरे गांव में हुए हैं ,

वो कच्चे मिट्टी वाले मकान अब पक्के हो गए हैं !


बदलाव भी बड़ी गज़ब प्रक्रिया है ,

अब देखो!

मकान तो सारे के सारे पक्के हो गए मगर रिश्ते-नाते , विश्वास और मेलजोल ये सब कच्चे हो गए !

कभी खेला करते थे जिस शैतानों की टोली में ,

आज व्यस्त और समझदार वो सब बच्चे हो गए |



कुछ अपनापन सा था उन कच्चे मकानों में,

जो मिला नहीं कभी इन पक्के मकानों में !



वो तंगहाली और ऊपर से घनघोर बरसात ,

घर की कच्ची छत से पानी का रिसाव ,

फिर भी अपनेपन का ना था कोई अभाव!



उस कच्ची छत में गोरैया के अनेकों घोंसले ,

मानो एक कच्चे घर में पूरा मोहल्ला बस गया हो !

दिन भर उनके बच्चों की चहचाहट ,

ऐसे लगता था जैसे सारे मिलकर शैतानियां कर रहे हों |



शाम ढ़लते ही लगता था जैसे दुनिया थम सी गयी हो,

आँगन में बैठकर घर वापसी करते पक्षियों को एकटक निहारना ,

ऐसा प्रतीत होता था ,जैसे वो भी अब आराम की तलब में हैं!

फिर कुछ पहर बाद गूँजता था सन्नाटा|

Img Source – http://images.sncurjanchal.in//2017/04/img-20170420-wa0062-583×330.jpg

मगर आज वो गोरैया कहीं गायब हो गयी ,
आसमान में पक्षियों की कतारें संध्या वेला से नदारद हो गईं!

भले ही उजाला अधिक हो इन बनावटी रोशनियों का ,

मगर शाम वाली वो बात अब गायब हो गयी,

रातें भले ही अब लोगों की चहल पहल से गुलजार हो चली हैं,

बड़ी बैचैन , परायी सी अब ये रातें हो गईं |



मकान कच्चे थे तो क्या हुआ ?

रिश्ते -नाते , चैन सुकून सब पक्के हुआ करते थे !

मेरे गांव के वो मिट्टी वाले मकान अब पक्के हो गए ||
शुभांकर 
© Confused Thoughts

मेरी छोटी सी रचना पढ़ने के लिए धन्यवाद ! 

आशा करता हूँ ,आप सभी कुशल मंगल अपने कार्य क्षेत्र में संलग्न होंगे !

इन्हीं शब्दों के साथ अब में विराम लेता हूँ !

सादर प्रणाम , राम – राम 🙏🙏🙏

मेरी माँ

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जन्म वगरह का तो कुछ याद नहीं कुछ ,

आपने भी बाकी सबकी तरह मेरे लिए दर्द सहा होगा !

हाँ उन दिनों को याद करके, मुझे आज भी हंसी आती है! जब मुझे जबरदस्ती पकड़कर दाल पिलाई जाती थी |

जो मुझे तब बिल्कुल पसंद नहीं थी |

शब्द ज्ञान , मात्रा , लेख सब कुछ सिखाया था,

अगर गलती करो तो डाँट भी लगाई जाती थी !

और जब मेरा दाखिला हुआ तो

रोज शाम को स्कूल से नाम कटाने की जिद्द करना ,

और फिर सुबह आपका मुझे तैयार करके फिर से स्कूल भेज देना !

ये क्रम लगातार चला!
मुझे आज भी याद है |

उसी का परिणाम है कि आज मैं कुछ लिखने लायक हुआ हूँ !

उस डाँट, जबरदस्ती और लगातार सुधारने का महत्व अब मैं भी समझ गया हूँ |

मेरी छोटी छोटी सफलता पर मुझसे भी ज्यादा खुश होना ,

हरेक बार मेरा आपकी बातों से प्रेरित होना!

और जब मेरी परीक्षाएं चलती थी रात रात को मुझसे भी बाद में सोना ,

और फिर मुझसे भी जल्दी जाग कर मेरे लिए नाश्ता बनाने के लिए खड़े होना|
ये त्याग आपने बिना शिकायत करे किया !

मेरी असफलताओं पर कभी प्रश्न नहीं किया , 
पुराना भुलाकर,आगे अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित किया !

बाकी सबके माँ बाप की तरह उम्मीदों का बोझ नहीं रखा कभी ,

मेरी असफलता के बावजूद भी आपके चेहरे पर क्रोध का भाव नहीं दिखा कभी !

मेरे जरा से बीमार होने पर 

आप आज भी व्याकुल हो जाती हो ,

खुद की छोटी बड़ी परेशानियों को बड़ी चालाकी से छुपाती हो!

मेरे हर निर्णय , हर एक कदम पर साथ देना ,

कोई भी नया कार्य करने से पहले और बढ़ावा देना !

ये सब आदतों में शुमार है आपके |
अभी आपके लिए कुछ कर नहीं पाया हूँ,

तो इसलिए झूठे वंचनो को में क्या कहूंगा !

हाँ भविष्य में ऐसा कुछ कर पाऊँ ,

ऐसी अभिलाषाएं में खुद से रखूंगा |

–  शिवा



©Confused Thoughts

please check out our channel and listen this poem in my voice – https://youtu.be/BE8aWHd1fN4

 

Happy Mother’s day