सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा !

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा !

​विस्फोटकों के डर से,

सेना हटती नहीं हमारी!

Indian Bloggers

अरि दल की  साजिशों से ,

गति रुकती नहीं हमारी!

अवशेष ,संस्कृति से ,

दृष्टि हटती नहीं हमारी !

अपवाद बंदिशों से ,

छवि डिगती नहीं हमारी !

कुछ खास है हममें ,

की हस्ती मिटती नहीं हमारी !

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ||



आदर्श देख इसके 

लोग सुदूर से आते हैं ,

विचार देख इसके,

चकित रह जाते हैं!

सत्कार देख यहां का,

वो यहीं  बस जाते हैं !

आलोचकों के इरादे सब ,

धरे के धरे रह जाते हैं ||



कोशिश हजार कर लो ,

बंदिश लगा के धर लो !

कसमें लगा लो जितनी ,

ताकत लगा लो जितनी !

मुँह एक साथ खोलेंगे ,

फिर एक स्वर में बोलेंगे –

“आसानी से मिटा दोगे,

हस्ती इतनी छोटी नहीं हमारी !

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा” ||



कितने भी जाति , धर्म 

और प्रान्त बना लो ,

छल-प्रपंच सारे तुम लगा लो !

सब अपने अपने गुट बना लो ,

फिर सज्जनों में फूट डालो!

चाहे धर्म की तुम लड़ाईयां लड़ा लो ,

फिर हवाओं में जादू डोलेगा,

देशप्रेम का अमृत घोलेगा !

हर युवा शान से बोलेगा –

“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा” ||



स्वतंत्रता के रंग में,

ध्वज देख कर गगन में !

सीना  गर्व से चौड़ता है ,

रक्तचाप तेजी से दौड़ता है!

रेशे चढ़ जाते हैं मेरे ,

कलाइयों और हाथों के!

ह्रदय तेज से धड़कता है,

हर एक अंग फडकता !

और मन कामनाओं में डूबा

की यहाँ जन्म हो दोबारा ,

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ||



भूतल  के  अंक में  ,

गढ़ा है तिरंगा प्यारा !

समतल से प्रांगण में ,

रहे स्वाभिमान हमारा !

उन्नति के प्रयास हों ,

ये ध्येय रहे हमारा !

हस्ती यूं हीं जीवित रहे ,

उद्देश्य ये हमारा !

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ||

जय हिंद, जय भारत !


आप मेरी इस कविता को मेरी आवाज में सुनना ना भूलें 

लिंक



©Confused Thoughts

शुभांकर

ये थोड़ा बेवकूफाना है मगर आप अपने विचार इस लिंक पर दे सकते हैं 😀

बोधकथा 4- बालक ध्रुव

आज बोधकथा के क्रम में आज मैं फिर से एक बोधकथा लेकर आया हूँ जो मैंने पहले की भांति स्कूल में सुनी थी –
पुरातन काल की बात है किसी राज्य में एक राजा रहता था , राजा का नाम उत्तानपाद था और राजा की दो पत्नियां थी पहली पत्नी का नाम सुनिती था और दूसरी का नाम सुरुचि था !

सुरुचि की संतान का नाम उत्तम था और सुनिती के पुत्र का नाम ध्रुव था उसकी उम्र 5 वर्ष थी , राजा को दोनों रानियों में से सुरुचि अधिक प्रिय थी और सुनिती को कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता था !

एक बार की बात है ध्रुव अपने पिता की गोद में खेल रहा था , तभी सुरुचि उसे खेलता देख लेती है और ईर्ष्या के कारण वो ध्रुव को गोद से उतारकर उत्तम को बैठा देती है , अब छोटा बच्चा ध्रुव शिकायत करता है कि मुझे क्यों उतार दिया आपने ?

तो सुरुचि तिरस्कार से कहती है “तुम राजा की गोद में तो बैठ नहीं सकते हां भगवान के पास जाओ सिर्फ वो ही तुम्हे अपनी गोद में बैठा सकते हैं ”

ध्रुव रोता हुआ सीधा अपनी माँ सुनिती के पास जाता है

सुनीति उसे दुलारती है समझाती है कि बेटा जिद्द नहीं करते जब उत्तम वहाँ नहीं रहेगा तब तुम बैठ जाना मगर ध्रुव कहाँ मानने वाला था वो लगातार पूछ रहा था मैं क्यों नहीं बैठ सकता आखिर वो मेरे भी तो पिता हैं !

सुनीति बेचारी निःशब्द हो जाती है और बच्चे के इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाती ,

मगर ध्रुव बाल बुद्धि था उसे अभी भी अपनी दूसरी माँ सुरुचि की बातें याद आ रही थी तब उसे याद आया कि कोई भगवान नाम का प्राणी है जो मुझे गोद में बैठा सकता है अगर मैं उनसे विनती करूँ तो बस यह बात उसके हृदय में घर कर गयी थी और रात को सबके सो जाने के बाद वो चुपचाप निकल पड़ा जंगल की ओर भगवान को ढूंढ़ने अब बच्चे की ऐसी हठ देख नारद ने उसकी मदद करने की तरकीब सोची और साधारण मनुष्य का रूप धारण कर उसके पास प्रकट होकर बोले  “पुत्र तुम रात्रि के समय घनघोर जंगल में क्या कर रहे हो अगर कोई जंगली जीव आ गया तो तुम्हारा भक्षण कर लेगा !”

ध्रुव निडरता से कहता है “मुझे भगवान के पास जाना है और माँ ने बताया है वो मुझे गोद में बैठाएंगे बस उन्हें ही ढूंढ रहा हूँ पता नहीं कहाँ रहते हैं वो क्या आप उनका नाम पता बता सकते हैं ?”
बालक की ऐसी हठ देख नारद भी अचंभित हो जाते हैं और बोलते हैं “पुत्र उनका नाम विष्णु है और वो खुद तुम्हारे पास आ जाएंगे अगर तुम उन्हें सच्चे मन से तप करके बुलाओगे , तुम सिर्फ “ओम नमो भगवते वासुदेवाय ” मंत्र का निरंतर उच्चारण करना जब तक वो खुद तुम्हारे सामने प्रकट ना हो जाएं !”

इतना कहकर नारद अदृश्य हो जाते हैं

वो बालक वहीं खड़ा होकर हाथ जोड़कर मंत्र का उच्चारण प्रारम्भ कर देता है , तप करते करते उसे रात दिन , धूप बरसात किसी भी बात की सुध नहीं रहती और बिना कुछ खाये पिये ऐसे ही छः मास तक घोर तपस्या करता है आखिरकार विष्णु भगवान उसकी तपस्या से प्रसन्न होते हैं और उसके सामने प्रकट होकर बोलते हैं “आंखें खोलो पुत्र !तुमने इतनी कम अवस्था में कठोर तप करके मुझे प्रसन्न कर दिया तुम अब मुझसे कोई भी वर मांग सकते हो ?”

ध्रुव आंखें खोलता है और भगवान को प्रणाम करते हुए बोलता है “भगवान मुझे हमेशा के लिए आपकी गोद में बैठना है मुझे अपने साथ ले चलो (बाल अज्ञानता के कारण उसे मोक्ष शब्द का ज्ञान नहीं था )

भगवान प्रसन्नता पूर्वक उसे अपनी गोद में बैठकर विष्णुलोक में खिलाते हैं और मोक्ष के बाद पृथ्वी लोक में सर्वोच्च स्थान देने का वरदान भी दे देते हैं !

मोक्ष प्राप्ति के बाद ध्रुव को एक तारे के रूप में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ जिसे हम आज भी ध्रुव तारे के रूप में जानते हैं और उसके उसे 7 ऋषि मुनि तारे के रूप में घेरे हुए हमेशा उपस्थित रहते हैं !

शिक्षा – सच्चे मन और पूरी निष्ठा लगन के साथ किसी कार्य को अगर कोई करे तो कोई भी कार्य इस पृथ्वी पर असंभव नहीं है !

बोधकथा guest post invitation
 बोधकथा -1
बोधकथा -2

बोधकथा 3- तुलसीदास

अगर आपके पास भी ऐसी कोई बोधकथा है तो आपका स्वागत है मैं अगले रविवार को आपकी कथा अपने ब्लॉग पर गेस्ट पोस्ट की तरह प्रकाशित करूँगा 

अधिक जानकारी के लिए 

You can send me a email – shubhankarsharma428@gmail.com

बोधकथा 3- तुलसीदास

बोधकथा 3- तुलसीदास

नमस्कार दोस्तों ,

कैसे हैं आप सभी , जैसा की मैंने अपनी पहले एक पोस्ट में बताया था कि बोधकथा का क्रम प्रत्येक रविवार को ऐसे ही चलता रहेगा , बस तो आज के क्रम में मैं आपको एक छोटी सी कथा सुनाने जा रहा हूँ जो मैंने स्कूल के दिनों में सुनी थी –


एक गांव में सामान्य सा लड़का था जिसका नाम था तीर्थंराम , पढ़ाई लिखाई में कोई ख़ास लगाव नहीं था तो घर वालों ने जल्दी ही उसकी शादी एक विदुषी कन्या से करा दी , जिसे पढ़ाई लिखाई का बहुत अच्छा अनुभव था क्योंकि उनके घर का माहौल वेद पुराण से गुंजित हुआ करता था मगर जब उन्होंने देखा की ससुराल में लोगों को इन सब कामो में दिलचस्पी नहीं है तो उन्हें बड़ा अजीब लगा मगर उन्होंने कभी घमंड नहीं किया कि मैं सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी हूँ इस घर में , तीर्थराम साधारण ग्रामीण था ,

अब नयी नयी शादी हुई थी वो भी रूपवती के साथ तो उसका ध्यान घर पर कुछ ज्यादा ही रहता था वो सारा दिन घर पर ही व्यतीत कर लेता था , पत्नी से इतना ज्यादा मोहित था कि एक पल भी उसे अपनी नजरों से दूर नहीं होने देता था , अब जैसा हम सबको पता है सावन के महीने में नयी ब्याहली बहु को मायके जाना होता है बस इसी तरह तीर्थराम की पत्नी भी मायके चली गयी , अब तो तीर्थराम को एक एक पल जैसे योजन के जैसे व्यतीत होते थे , एक एक दिन गिनता की कब सावन खत्म होगा !

अब आपको तो पता है प्रेम में व्याकुलता कुछ ज्यादा होती है , एक दिन व्याकुलता चरम पर थी अब शाम का समय था वर्षा घनघोर थी मगर तीर्थराम की जिद थी की आज कैसे भी मायके जाऊंगा और अपनी प्रिय पत्नी से मिलाप करके आऊंगा , घर वालों ने लाख समझाया परंतु वो जिद्द करके निकल पड़ा ! अब दिन छिप गया था वर्षा थमने का नाम नहीं ले रही थी और ससुराल जाने के लिए नदी पार करनी होती थी अब इतनी रात में कोई नाविक भी नहीं था तभी तीर्थराम ने देखा की कोई लकड़ी का बांस तैरता हुआ जा रहा है क्यों न इसी के सहारे नदी पार की जाये बस जैसे तैसे तीर्थराम ने उफनती हुई नदी पार की जब वो पार पहुंचे तो उन्हें ज्ञात हुआ वो बांस नहीं किसी की लाश थी जो तैरती हुई जा रही थी मगर वो प्रेम में अंधे हुए लाश को पकड़ कर इस पार आ गये , अभी भी उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ

दौड़ते हुए गांव में घुसे , ससुराल में घर के बाहर से देखा तो पहली मंजिल पर अट्टा पर एक कमरे में रौशनी थी ,उन्हें आभास हुआ ये जरूर उनकी पत्नी होगी रात में अध्ययन कर रही होगी बस उन्होंने आव देखा न ताव देखा ऊपर चढ़ने की युक्ति खोजने लगे तभी उन्हें रस्सी लटकी हुई दिखाई दी वो उसे ही पकड़ कर झट से ऊपर पहुंच गये और पत्नी को आवाज दी

तीर्थराम की आवाज सुनकर वो दौड़ती हुआ बाहर आई और तीर्थराम के हाथ में एक लंबा काला सर्प देख चिल्ला उठी दरअसल वो सांप को ही रस्सी समझ बैठे थे तो पत्नी ने झटक कर सांप को नीचे फेंक कर बोला , तुम्हे इतना पता नहीं चला की सांप है या रस्सी ?

तीर्थ राम मुस्कुराकर प्रेम पूर्ण तरीके से बोले “प्रिये तुम्हारे लिए मै इतनी घनघोर वर्षा का सामना करते हुए आया और तो और लाश को बांस समझ कर नदी पार कर डाली और सर्प को रस्सी समझ अट्टा पर चढ़ गया , ये सब मेरा प्रेम है तुम्हारे लिए मैं तुम्हारे बिना पल भर भी व्यतीत नहीं कर पा रहा था ?

ये सारे वचन सुनकर पत्नी को बड़ा अचंभा हुआ और वो तिरस्कार से बोली

“मुझे नहीं पता था आप इतने महान मुर्ख हैं

अरे मुर्ख !अगर इतना प्रेम तुमने राम से किया होता तो आज तुम कुछ और बन गए होते , पत्नी से प्रेम करने की जगह ज्ञान में समय बिताया होता तो प्रकांड ज्ञानी बन गए होते , तुम व्यर्थ हो इस पृथ्वी पर ”

ये सारे वचन क्रोध में पत्नी ने जब बोले तो तीर्थराम को बहुत ग्लानि महसूस हुई और उन्होंने बिना कुछ बोले वापस होना शुरू कर दिया , वर्षा इतनी घनघोर थी उसकी पत्नी को बुरे वचनों पर पछतावा हुआ उसने खूब माफ़ी मांगी मगर वो अब रुकने वाला नहीं था और निकल गया गांव से बाहर मगर वो इस बार अपने गांव वापस नहीं जा रहा था वो जा रहा था ज्ञान अर्जित करने उसने दो तीन वर्ष कठोर परिश्रम किया और संस्कृत , हिंदी जैसे विषयों में ख्याति अर्जित की और पूरे जगत में स्वामी गोस्वामी तुलसीदास के नाम से प्रसिद्ध हुए बाद में उन्होंने रामायण के हजारों श्लोकों को सरल हिंदी भाषा में अनुवादित कर दिया और वो आज भी रामचरित मानस के रूप में पूरे भारत में पढ़ी जाती है !


 शिक्षा – धन , संपत्ति , प्रेम , रिश्ते इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण शिक्षा भी होती है  क्योंकि किसी ने कहा है शिक्षा शेरनी के दूध की तरह होती है जो भी इसे पियेगा वो दूर तक दहड़ेगा ! समाज में , घर में हमारी इज्जत तभी होती है जब हमारे अंदर कोई गुण हो वरना अज्ञानी मनुष्य मुर्ख की श्रेणी में रखा जाता है !


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 बोधकथा -1
बोधकथा -2
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