लिबास 

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​तन ढ़कने के लिए या फिर लाज हया के लिए किसी कारीगर ने ये लिबास,

शाम ढ़लते बाजारों में बनावटी चकाचौंध में दुकानों पर सजे हैं ढ़ेरों लिबास !
कुछ कौड़ियों में बिक रहे हैं 

बड़े कीमती हैं कुछ लिबास,

कुछ सूती, कुछ मख़मली तो कुछ रेशमी धागों से बने हैं ये सब लिबास !

खैर ये नहीं थी कोई बात खास|

आज बात होगी नज़र – ऐ-जहाँ  की ,

इंसान के गुस्ताख़ आलम और बनावटी समां की !
ऐ ! आदम तेरी शेखियाँ इंसानियत के लिए ख़तरनाक हैं,

तेरी एक तरफा अदालत में वकील बनी नज़र की दलीलें दर्दनाक हैं |
कुछ सच्चाई के किस्से फरमाता हूँ,

जगज़ाहिर हक़ीक़त से आपको दोबारा रूबरू कराता  हूँ!

इन लिबासों में छिपा कोई करिश्मा है,

यक़ीन नहीं तो अपनी चश्मदीद आंखों से पूछ लो !

ये तुम्हारी आंखें चश्मदीद गवाह हैं ,

लिबासों की करतूतें उन्हें खूब अच्छे से पता हैं|
अच्छा देखो!

ये सड़क किनारे कौड़ियों के लिबास पहनकर इंसान भी दो कौड़ी का हो जाता है ,

वो ऊंची दुकान पर शीशे में कैद कीमती लिबास पहनकर शैतान भी फ़रिश्ता बन जाता है!

आँखों के इस तुग़लकी फ़ैसले के लिए क़सूरवार किसे ठहराऊं,

दोष दूँ लिबास को या नज़र – ए – जहाँ के बनावटी गुमान की करतूत बताऊँ!



वो  सुल्तान – ए – जहाँ भी आज ख़ुद पर अफ़सोस तो करता होगा ,

क्या नेक इरादों से उसने तिलस्मी चीज़ बनायी थी “इन्सां “!

लिबासों की क़ीमत ख़ूब बढ़ीं हैं ,

मेरी कारीगरी का मक़सद  “इंसानियत” अब है कहाँ?

जज़्बात , इरादों और जिंदादिली की कीमतें गिर गयी हैं बाज़ारों में!

बेशकीमती हो गया है ये दिखावटी लिबास|

बेशकीमती हो गया है ये दिखावटी लिबास||

शुभांकर 
© Confused Thoughts


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6 thoughts on “लिबास 

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