अंतिम दृश्य भाग -९

एक बड़ी सी कॉलोनी के बाहर लम्बा सा लोहे का जालीदार दरवाजा है और उसपे बैठे हुए दो बीमार से चौकीदार उनकी शायद शक्ल ही ऐसी है बेचारे सुबह से शाम तक गाड़ियों के नम्बर नोट करते हैं कभी कोई रुकता नहीं तो गाड़ी के पीछे उड़ती धुल भी खा लेते हैं ,क्या करें नौकरी है साहब महीने के अंत में दस हजार रूपये मिलेंगे तब जाकर घर के पांच सदस्यों के लिए रोटी का इंतजाम होता है !

खैर मैं भी क्या गेट पर ही अटक गया 😁😁 चलो आगे बढ़ते हैं एक गली कट रही है गेट से सीधे १०० मीटर चलने के बाद साथ में गली के बगल में एक छोटा सा पार्क है जिसमें २०-२५ छोटे बड़े बच्चे खेल रहे हैं यही कोई 6-7 बड़े लड़के वॉलीबॉल खेल रहे हैं

बाकि 2-3 बेचारे खड़े देख रहे हैं दरअसल बात यह है कि मन तो उनका भी बहुत है खेलने का मगर उनकी उम्र उनके आड़े आ रही है सारे लड़के उन्हें छोटू बोलकर खेल देखने को बोल देते हैं कभी कोई मौका ही नहीं देता अब इन पागलों को कौन समझाए क्रिकेट की पिच पर 17 साल का सचिन २९साल के बॉलर की तेज गेंद पर छक्का मारने में देर नहीं लगाता था !

खैर छोड़िये वो देखिये वहां पार्क के दूसरे कोने पर कुछ सीट्स लगी हैं जिनमे से एक सीट पर शक्तिप्रसाद भी बैठे हैं और निहार रहे हैं आसमान में जाती हुई पंछियों की कतारों को , शाम होते ही गलगल कबूतर कतार में घर वापसी करते हैं तो पूरे गांव में उनका कोलाहल साफ़ सुनाई देता है

मगर यहां तो शहर में वाहनों का इतना भीषण शोर है कि किसी पक्षी की आवाज तक सुनाई नहीं देती , शक्ति प्रसाद देख ही रहे थे तभी पीछे से एक आवाज आई 

“पिताजी घर चलिए खाना तैयार है ” ये आवाज थी सुधीर की वो अब ऑफिस से वापस आ गया था और आने के बाद सीधे पार्क की तरफ तेजी से आया है 

आज शहर आये चार महीने गुजर गए थे शक्तिप्रसाद को शायद एक एक दिन का हिसाब किताब मालूम होगा मगर वो कभी जाहिर नहीं होने देते थे हाँ दिनचर्या आज भी वही पुरानी वाली थी तभी तो 6 बजे खाना लग गया था उनके लिए क्योंकि सबको पता है सूर्यास्त के बाद शक्तिप्रसाद अन्न ग्रहण नहीं करते हैं , सारा परिवार ९बजे खायेगा मगर पिताजी का खाना शाम को ही लग जाता है वैसे भी खाना खाने के बाद उन्हें टहलने जाना होता है उसके बाद वो ९बजे तक सो भी जाते हैं !

टीवी देखने का उन्हें शौक है नहीं , बहु सारा दिन कहती है पिताजी आप टीवी देख लिया करो सारा दिन कैसे व्यतीत होगा , अब जिस व्यक्ति ने पूरा जीवन गांव , खेत, खड़ंजे , मेड़ पर घूमते हुए या फिर काम करते हुए निकाल दिया हो वो खाली बैठकर टीवी से मोह कहाँ करेगा मगर अब ये उनकी मजबूरी जरूर है कि आज ज़िन्दगी पुरे बड़े गांव से लेकर एक छोटे से 14×14 के कमरे में सिमट कर रह गयी है !घर में कुल तीन कमरे हैं,दो बड़े कमरे एक छोटा (गेस्ट रूम) एक में सुधीर और उसकी पत्नी , दूसरे बड़े कमरे में बच्चे , अब बच्चों को भी तो पढाई के लिए एकांत चाहिए !

शाम को ४-५ बजे शक्तिप्रसाद पार्क की तरफ निकल जाते हैं वहां कुछ और भी बूढ़े बुजुर्ग आते हैं जिनमें अधिकतर सरकारी सेवानिवृत्त हैं तो उनकी बातें भी पेंशन , देश विदेश , राजनीती वाली होती हैं शक्तिप्रसाद बेचारे इन सबसे कभी मुखतिब नहीं हुए हैं तो वो बस चुपचाप सुन लेते हैं , हाँ कभी शहर की समस्या वगरह की बातें होती हैं तो वो भी एक दो बातें बता दिया करते हैं क्योंकि गांव की एक एक समस्या पर उनका ध्यान रहता था सबकी फ़रियाद वो सुनते थे

बस यही दिनचर्या थी हाँ सुबह चार बजे उठने वाली बात बतानी तो मैं भूल ही गया , आज भी चार बजे उठना और नहा धोकर साफ़ स्वच्छ वस्त्र पहनकर वो पास के ही शिवमंदिर पर जाते थे आखिर पक्के शिवभक्त जो ठहरे बिना दर्शन किये उनसे कहाँ रहा जाता था वो बात अलग थी की गांव में कुछ दिन अपने भगवान् से रुष्ट हो गए थे मगर इसमें हम कुछ कह भी नहीं सकते ये भगवान् और भक्त के बीच का मामला है !

७बजे दोनों बच्चे घर से निकल जाते हैं और ८बजे सुधीर ऑफिस चला जाता है अब घर पर रह जाते हैं सिर्फ दो प्राणी ससुर और बहू , बहू के पास तो बहुत सारे काम होते हैं जैसे कपडे धोना , ढेर सारे गंदे बर्तन और झाड़ू पोछा ना जाने क्या क्या !

मगर शक्तिप्रसाद बेचारे क्या करें ?

उनके लिए तो यहां कोई काम ही नहीं बचता हाँ कुछ दिनों से जिद्द करके वो सब्जी लेने निकल जाते हैं मगर सब्जी तो शाम को आती है सारा दिन कैसे व्यतीत करें , कोई इंसान सारा दिन सो भी तो नहीं सकता

वो भी ऐसा इंसान जिसे खेत में फावड़ा चलाये बिना खाना तक हजम नहीं होता था और शाम को दो चार दांव पेंच चलाये बिना रात को सुकून की नींद नहीं आती थी  मगर ज़िन्दगी है साहब हम सब तो सिर्फ कठपुतली हैं ऊपर वाले की , सारा खेल तो वो ही खिलाता है !

शक्तिप्रसाद को कोई काम इसलिए भी नहीं करने दिया जाता की कहीं पडोसी बोले की बुजुर्गों से काम करा रहा है 

बेटा जवान है और बाप काम कर रहा है वैसे  शहर में ऐसा कोई ख़ास काम होता भी कहाँ है वही खाना बनाना और खा लेना इससे ज्यादा घर पर कोई काम नहीं होता 

और जो भी हो रहा है उसपर हम कुछ कह भी नहीं सकते सब कुछ विधि है साहब विधान ऊपर से लिखकर आता है !

 आगे पढ़ें …….
©Confused Thoughts 

अगर आप अंत तक पढ़ रहे हैं तो आपको मेरा बहुत बहुत धन्यवाद  साथ ही साथ अपने विचार देना न भूलें 

पिछले भाग के बाद ये भाग काफी दिनों बाद प्रकाशित हुआ है इसके लिए क्षमा चाहूँगा कुछ आवश्यक कारणों से मुझे देरी हो जाती है 

धन्यवाद


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9 thoughts on “अंतिम दृश्य भाग -९

  1. क्या बात सर ——उस प्रत्येक बेटे की यही कस्ट है—–मम्मी पापा को अकेला छोड़ नहीं सकता—–खुद उनके पास रह नहीं सकता—-और माँ पापाबके लिए तो सच में शहर कोई जेल से कम नहीं——कितने बेचारे है हम——-ख़ुशी की तलाश में कितने दूर आ गए हैं हम—–बहुत ही बढ़िया लिखा है आपने —–दिल को छू गया।

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