बोधकथा – मितव्ययी बनो

​आज की बोध कथा मैंने अपने स्कूल में किसी शिक्षक के शब्दों में सुनी थी शब्दशः मुझे याद नहीं मगर उसका सार मैं आपको सुनाता हूँ शायद ये कथा अपने भी कहीं सुनी हो

 जैसा की बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के बारे में सभी ने सुना है जिसकी स्थापना पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने की थी , ये किस्सा उन दिनों का है जब पंडित जी ने विश्वविद्यालय बनाने का संकल्प लिया मगर स्थापना के लिए एक बड़ी राशि की आवश्यकता थी इतनी राशि पंडित जी के पास तो थी नहीं मगर फिर भी उन्होंने आस पास के गांव जाकर लोगों से चंदा एकत्रित करना शुरू किया

वो बारी बारी से धनी सेठो के पास जाते और उनसे शिक्षा के मंदिर के निर्माण के लिए योगदान मांगते , कुछ दयालु सेठ , साहूकार श्रद्धा अनुसार धन देकर पंडित जी को विदा करते तो कुछ दुत्कार कर भगा देते 

एक बार किसी ने पंडित जी को बताया फलां गांव में बड़ा धनी साहूकार रहता है और वो समाज कल्याण के कार्यों में हमेशा योगदान देता है , पंडित जी शाम के समय वहां पहुंचे तो साहूकार कुछ आवश्यक कार्य कर रहा था इसलिए उसने पंडित जी को प्रतीक्षा करने के लिए बोला और खुद पंडित जी के पास में ही अपना कार्य करता रहा ,

 अब पंडित जी सोच रहे थे बड़ा कंजूस है देखो दीये के प्रकाश में ऑंखें फोड़ रहा है ये नहीं की लैंप खरीद ले मगर फिर भी वो धैर्य के साथ प्रतीक्षा करते रहे इतने में साहूकार का एक छोटा सा लड़का खेलता हुआ कमरे में घुसा और उसने खेल खेल में माचिस उठा ली और कुछ ही देर में उसने दो तीली बिगाड़ दी अब जैसे ही काम खत्म करने के बाद साहूकार की नजर अपने बेटे पर पड़ी उसने फटाक से माचिस छीनी उसके हाथ से और दो तीन थप्पड़ लगा दिए उसके गाल पर और बोला 

“इतनी मेहनत का पैसा ऐसे खराब करेगा ,पता भी है तूने 2 तीली बिगाड़ दी ”

अब पंडित जी को ये बात बड़ी आश्चर्यजनक लगी और वो मन ही मन सोचने लगे वैसे तो इतना धनी सेठ है और 1 आने की माचिस की तीली के लिए इकलौते लड़के को थप्पड़ लगा दिये, ये तो बड़ा ही कंजूस है इससे में धन की अपेक्षा कैसे रख सकता हूँ !

जो दीपक की रौशनी से लिखा पढ़ी कर रहा हो और एक एक तीली पर ऐसे गुस्सा कर रहा है मानो लाखों का नुकसान हुआ हो , ये कैसे दे सकता है चंदे की राशि

अब वो सेठ पंडित जी के पास आया और राजी ख़ुशी लेने लगा कुछ देर बाद पंडित जी ने सोचा रात होने वाली है और वैसे भी यहां रुकने का कोई फायदा नहीं तो वो बोले ठीक है तो अब हम विदा लेते हैं जब सेठ मुख्य द्वार तक पंडित जी को विदा करने आया तो पंडित जी से बोला वैसे पंडित जी आपने बताया नहीं कैसे आना हुआ हमारे घर?

 पंडित जी पहले संकुचित हुए मगर फिर बोले हम विश्वविद्यालय का निर्माण करने जा रहे हैं उसी के लिए चन्दा एकत्रित कर रहे हैं आपके पास भी आये थे मगर जो व्यक्ति 2 तीली के लिए बेटे को मार सकता है वो चन्दा कहाँ दे पाएगा

सेठ बोला रुकिए आप यहीं और अंदर से एक पोटली निकाल कर लाया और बोला ये २५०००(उस समय की बहुत बड़ी राशि) रूपये हैं , अगर इस धर्मार्थ के कार्य में मेरा कुछ धन काम में आता है तो ये मेरे लिए सौभग्य की बात है पंडित जी स्तब्ध थे सेठ उनके चेहरे का भाव समझ गया और बोला पंडित जी मेरा बेटा अभी छोटा है अगर वो ऐसे धन को व्यर्थ करेगा तो ये आदत से व्ययी बना देगी और धर्म का व्यय हमेशा धर्मार्थ के कार्यों में होना चाहिए न की फिजूलखर्ची में , पंडित जी ने सेठ को प्रणाम किया और गंतव्य की ओर निकल पड़े और मन ही मन खुद को कोस रहे थे की उनके मन में ये बात आ कैसे गयी थी और वो सेठ तो मुझसे भी ज्यादा समर्पित निकला

 शिक्षा -इस बोधकथा से हमे दो शिक्षाएं मिलती हैं 

1- कभी भी खुद से किसी व्यक्ति के स्वाभाव का निर्णय नहीं कर लेना चाहिए 

2- धन का उपयोग धर्मार्थ के कार्यों में करना चाहिए ना की व्यर्थ में 

क्योंकि व्यर्थ में व्यय हुए धन से किसी को कोई लाभ नहीं मिलेगा मगर धर्मार्थ से बहुत सारे लोगों को लाभ मिलेगा इसलिए मितव्ययी बनो|

धन्यवाद 

©Confused Thoughts
अपने विचार देना ना भूलें अगर ऐसी कोई बोधकथा आपको भी आती है तो आप मेरे ब्लॉग पर सादर आमंत्रित हैं आपकी कथा गेस्ट पोस्ट सीरीज में अगले रविवार को पब्लिश  होगी,   अधिक जानकारी के लिए आप मुझे मेल करें 

Shubhankarsharma428@gmail.com

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