नुमाइशें

ये रंग रोगन रूप यौवन ,

चमक दमक और जवानी 

खेल है सिर्फ दस साल का 

फिर दाद ,खाज , खुजली 

जोड़,पीठ ,गर्दन दर्द बीमारी

यही होगी हर एक की कहानी !
ये खिलता सा यौवन ,

मुरझा सा जायेगा 

चमकता हुआ ये चेहरा 

   धूल    खायेगा !
आज तुम कोई चाँद हो शहर का 

कल तुम्हारी जगह लेने कोई और चाँद आयेगा ,

ये नुमाइशों के सिलसिले जमाने में 

तारीख दर तारीख़ चलेंगे ,

कुछ रसिक लुत्फ़ उठाएंगे नुमाइश का 

फिर वो भी अपने घर निकल लेंगे !
बाद में जब कभी नुमाइश से ऊब जाओ 

तो तहज़ीब वाले मुहल्ले में आकर तो देखना ,

इस झूठ वाले मक़ान के उस फ़रेबी झरोखे से पर्दा हटाकर देखना !
वो खूब दूर तलक गरीब खाने नज़र आएंगे 

तब जाकर तुम्हे रिश्ते नाते ,तौर तरीके सब अच्छी तरह समझ आएंगे ,

और फिर तुम्हे तुम्हारी औकात ,रुतबा 

दोनों बिलकुल साफ साफ दिख जायेंगे !
©Confused Thoughts

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20 thoughts on “नुमाइशें

  1. जिंदगी का कठोर सत्य दिखा दिया आपने कुछ ही पन्क्तियो में –
    और फिर तुम्हे तुम्हारी औकात ,रुतबा

    दोनों बिलकुल साफ साफ दिख जायेंगे !

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  2. जीवन एक रंगमंच है, हम उसके कलाकार आपकी कविता उस कलाकार की हस्ती को बेहतरीन ढंग से उकेरती है।

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  3. जिंदगी की कड़वी सच्चाई। आज जिस्म की नुमाइश ने जो औकात दिखाई।
    हरेक पे होता है उमर का नूर, परहर कोई बेपर्दा नहीं होता

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