सती कथा -१

भगवान शिव और सती कैलाश पर बैठे हुए हैं, तभी सती देखती है आकाश में कुछ विमान जा रहे हैं-

एक दिन प्रात: भोर बेला में 

कैलाश पर्वत की दुर्गम श्रृंखला में 

शिव – सती शिला पर विराजे हैं 

देख गगन में विमान पंक्तिबद्ध 

बोली सती सहज उत्सुकतावश-

प्रभु एक बार तो देखो गगन को

कभी मन्द कभी तीव्र चलायमान पवन को

विमान की कतारों से खचाखच गगन को 

क्या आज कोई विशिष्ट दिवस है

सर्वज्ञानी मुस्कुराकर बोले 

विमान के ओर दिखाकर बोले 

सभी देव – देवांगनाओं को निमंत्रित किया 

दक्ष ने आज महायज्ञ आयोजित किया है।
कुछ चकित हुए खिसियाकर बोली 

“क्या हमें निमंत्रण नहीं आया?

बताओ प्रभु हमारे पास नहीं है क्या कोई बुलावा?”
शंकर फिर मुस्कुरा कर बोले

सती को समझाकर बोले 

देवी तात तुम्हारे रुष्ट हुए है

देवसभा में मुझसे क्रुद्ध  हुए है 

बैर के सामने ना वे संबंध देखते 

अब मुझ शत्रु को निमंत्रण क्यों भेजते 
सुन वचन प्रभु के स्तब्ध हुई

मगर उत्सव की कल्पनाओं में बद्ध हुई

हे नाथ! मेरे प्रभु प्राणपति

माना क्रूद्ध है आपसे प्रजापति 
किन्तु मैं तो हूं कन्या उनकी

क्यों प्रतिक्षा करूं निमंत्रण की?
महादेव शांत होकर बोले

देवी अब तुम मेरी अर्धांगिनी हो

युगपर्यंत जीवन संगिनी हो

कैलाश तुम्हारा निवास स्थल है

माना दक्ष प्रजापति पिता है तुम्हारे

कनखल मात्र अब जन्म स्थल है

माना पितृ स्नेह चरम है तुम्हारा

मगर पति की आज्ञा धर्म है तुम्हारा

बिना निमंत्रण अगर वहां जाओगी

निश्चित तिरस्कार, अपमान पाओगी।
“प्रभु क्षमा चाहती हूं आपसे

मेरे रात्रि – दिवस घटित होते हैं आपसे।

पति परमेश्वर हो आप मेरे
प्रभु आपके चरणों में भाग्य मेरे

वहां सभी अग्रजा आईं होंगी

नाना सखियां भी बुलवाईं होंगी

अपमान क्षण भर भी ना सह पाऊंगी

अगर घटित हुआ तो वापस लौट आऊंगी

महादेव अंतत: मान गए

गणों के फिर समीप गए

सुनो वीरभद्र तुम आज कनखल जाओगे

अपनी माता को भी साथ ले जाओगे

सुन वचन प्रभु के वीरभद्र गदगद् हो बोले

जो आज्ञा भोले, बोल बम – बम भोले।
देख सती को दक्ष तिरस्कार पूर्ण बोले,

“अपमान मेरा मैं सह ना सकूंगा

देख तुम्हें यूं वनवासी भेष में

चुप एक पल भी मैं रह ना सकूंगा

सुन वचन पिता के सती को आघात हुआ

और मन ही मन पश्चाताप हुआ

महादेव के वचन याद आ रहे थें

कुविचार मन मस्तिष्क को निगले जा रहे थें!

घूंट पी कटू वचनों का सती पहुंची अब यज्ञ स्थल पर

सभी देवों के भाग बने हुए थें

महादेव का ना कोई भाग बना था

स्वयं का अपमान वो सह सकती थी

महादेव का तिरस्कार ना सह सकती थी

ऊंचे स्वर में फिर वह बोली

हे तात यहां क्या खेल बना है

महादेव का भाग क्यों नहीं बना है
फिर दक्ष कुपित होकर बोला

मेरा संबंधी नहीं वो दरिद्र भोला

नाग, भस्म, पेड़ों की छाल धारता है

सुध – बुध नहीं उसे जग की, सारा दिवस भंग मारता है

छवि की उसको सुध नहीं, भूतों का सरकार बनता है

जंगली, दरिद्र कहीं का, हड्ड माला पहनता है
सुन वचन पिता के कंपित हो गई

तिरस्कार से वो क्रुद्धित हो गई
कुछ सूझा नहीं था मन में उसके

लाचार, बेसुध – सी यज्ञ कुण्ड में कुदकर अग्नि को प्रिय हो गई।.

वीरभद्र सब देख चुका था,

क्रोधित हो स्थान से उठा था

अगले क्षण में फरसा धार लिया!

मुण्ड दक्ष का उतार दिया

थे देव सन्न कोई कंपकंपा रहा था

समूचे यज्ञ स्थल पर हाहाकार मचा था!
©Confused Thoughts 

मुझे नहीं पता आपको कैसा लगा ? वैसे फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि ये सिर्फ अपने लिए लिखी है  महादेव की भक्ति का इससे अच्छा मौका नहीं है 

अगर आप पढ़ लेते हैं तो हर हर महादेव जरूर लिखें !

धन्यवाद 

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6 thoughts on “सती कथा -१

  1. Beautiful! Im going over to the next part now but I have to add – Bholenath is my favorite of the Gods because he’s a true ascetic. That’s how God’s should be, without gold, thrones and women thronging them. और Shiv Sati की यह प्रेम गाथा कोई Romeo Juliet से कम नहीं है

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