स्वाभिमान 

ख्वाबों में आकर दुनिया सजाती थी 

मुझे पता था वो सब वहम था मेरा
मगर तू भी मुझे कुछ कम नहीं उकसाती थी
खैर मैंने अब तुझे भुला दिया
तेरा नाम पता सब मिटा दिया
आखिर स्वाभिमान भी अहम था मेरा !

कोशिश तो की थी मैंने भी   भरपूर मगर

हर   बार  उसे नाकाम बनाना रहम था तेरा

क्या पता मैं ही गलत था ?

क्या पता मेरा सब कुछ एकतरफा था ?

अगर ये सब सच है तो 

फिर मुझे रिझाने का क्यों जतन था तेरा?


जाने क्या पागलपन था मुझको 

दिल पर पत्थर रखकर कोशिशें करता था 

शायद तेरे तेवर बदलने की उम्मीद थी मुझे 

तभी मैं खुद की बनाई बंदिशें खुद ही चूर करता था !


एक तरफ दिल की जिद्द थी तुझे हर हाल में मनाने की 

दूसरी तरफ उस घायल मन की पुकार थी 

तुझे हमेशा के लिए भूल जाने की 

तूने भी खूब छकाया अपनी बेरुखी दिखाकर 

तुझे कहीं ना कहीं लगा की 

ये तो इसकी आदत है गिड़गिड़ाने की !


आखिर मन के आगे दिल हार गया 

ख्वाब उसका चकनाचूर हुआ 

एक ना चलने दी मन ने उसकी 

फिर वो ख्वाब आँखों से दूर हुआ 

स्वाभिमान भी जरूरी होता है 

बस यही सोचकर मैं तुझसे दूर हुआ 

पीछे मुड़कर देखना फितरत में नहीं मेरे 

बस यही सोचकर तुझे कभी ना देखने का कठोर फैसला 

मेरे दिल की अदालत में मंजूर हुआ !

story

 

@CONFUSED THOUGHTS

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12 thoughts on “स्वाभिमान 

  1. कोई इतना ignore करे तो उन्हे उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए। स्वाभिमान बहुत ज़रूरी होता है। हां अपनों के लिए स्वाभिमान को दबाया जा सकता है। पर जो अपना हुआ ही नहीं उसके लिए नहीं.

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