सैनिक

कभी तपती दुपहरी में

मैदान के बीचों – बीच खड़ा है!

आज इसी दिन के लिए वो 

तूफान – सा दौड़ा है!

प्रथम आया है वो प्रतियोगिता में 

तभी गर्वित होकर चयनित खड़ा है!

कुछ करने की ललक है हौसलों में इसके 

तभी देश सेवा के लिए 

बिल्कुल उत्सुक खड़ा है!

फिर गांव की गलियॉं सुनसान कर चला वो

अपने घर को एकदम वीरान कर चला वो 

आखिर देश की रक्षा करनी है उसको 

अचानक दोस्तों को भी हैरान कर चला वो 

मॉं की आखों में अश्रु ला कर 

एक मॉं की खातिर अभिमान से चला वो ! 

मॉं तो आखिर मॉं होती है 

ममता को सन्नाटे में गुमनाम कर चला वो !

आगे का क्रम कुछ ऐसे बढ़ा फिर

आज वो सिपाही पर्वत पर खड़ा है 

बर्फ पड़ रही है पर्वत के तल पर

भीषण ठंड़ में भी चट्टान – सा अड़ा है!

देश का रक्षक है वो आखिर 

तभी तो इतने गुमान से खड़ा है!

बाहर का प्रहरी तो ये है मगर

अब अन्दर का क्रम कुछ ऐसे बढ़ा है!

राजनीति का जैसे जुनून – सा छाया है

लोगों को कुछ अलग शौक चढ़ा है!

वाद – विवादों की सीमा नहीं अब 

देशभक्ति शब्द खुद कटघरे में खड़ा है!

वोटों की राजनीति के बोझ तले दबकर

वो विकास कहीं गर्त में पड़ा है! 

हाथों को जोड़े बहरूपिया के भेष में 

हजारों की भीड़ में आन – बान से खड़ा है!

जनता का हाल मत पूछो 

उस रात्रि हुए बवाल को मत पूछो 

धर्म के आड़ में होती है बर्बादी फिर भी

 हम काल के गाल में जायेंगे मत पूछो !

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है सबको

सोशल मीडिया का युग है अब तो 

खूब होते हैं शब्द युद्ध यहां पर 

मुद्दा भी देशभक्ति है अब तो !

वो अभागा सैनिक तो अभी भी खड़ा है 

आप लोगों की सारी हरकतें जानते हुए भी

वो आज भी वहां  सीमा पर चुपचाप खड़ा है !
© Confused Thoughts 

सती कथा -2

सारा दृश्य भोलेनाथ समाधी में बैठे बैठे देख रहे थे मगर सती के यूँ अग्नि में कूदने से वो विचलित हो उठे –

अब आगे 

भंगुर हुई समाधि कालेश्वर की 

लाल मुख नेत्र विकराल महेश्वर की 

गण चकित हुए ,भूत प्रेत मन ही मन बोले 

क्या त्रुटि हुई हमसे भोले ,हमें क्षमा करो हे भोले !

फिर प्रकट हुए वो कनखल में 

शांति सी छा गयी समस्त हलचल में 

डगमग डगमग दिक् गज डोले 

जब क्रोधित हुए बम भोले!

पृथ्वी आकाश पाताल 

अग्नि वायु और भुताल,

गौ, कच्छप ,गज और ब्रह्माण्ड 

सब भयभीत थे ऐसे जैसे 

अब होगा कोई भीषण विश्व संग्राम !

पक्षी जंतु सब स्तब्ध खड़े थे 

देव जन नतमस्तक पड़े थे ,

हुआ शांत प्रकृति का संगीत अब

सामान्य जन का तो हाल व्यथित था 

कुछ मूर्छित थे बाकि भयभीत थे सब !
देख सती को दहनते हुए 

महादेव प्रेम से द्रवित हुए ,

दहाड़ उठे वो गगन तक 

कन्धों पर शव सती का लिए !

गर्जना सुन गगन तक डोला 

जब ताण्डव नृत्य करने लगे बम भोला 

नेत्रों में ज्वाला झांक रही थी

वसुधा भी थर थर काँप रही थी 

आशंका थी उसे विनाश प्रलय की 

नृत्य का भार वो भलीभांति भांप रही थी !!

 .ऋषि ,मुनि  ,राक्षस ,चांडाल ,श्वान 
मनुज , देव और जन जीव तमाम 

रहे देख रौद्र रूप का स्वांग 

और लगा रहे त्रिदेव का ध्यान 

रक्षा करो हे भगवान !

तब हरी ने अवतार लिया 

तर्जनी में सुदर्शन धार लिया ,

भूतेश्वर यत्र तत्र भाग रहे थे 

हरी अंग सती के काट रहे थे 

जब नहीं शेष रहा कोई अंग सती का ,

तांडव स्थगित हुआ कैलाशपति का

भ्रमण पुनः आरम्भ हुआ वसुंधरा का 

प्रवाह चला पवन और गंगा का !

गिरे अंग सती के इक्यावन स्थान 

वो सभी आज हैं तीर्थ धाम 

गण, देव , भूतप्रेत सब एक स्वर में बोले 

बम बम भोले बम बम भोले !
कथा समाप्त –

सती कथा -१ 

अगर आप पढ़ रहे हैं तो एक बार 

बम बम भोले बोलें और मेरा उत्साहवर्धन करें !

धन्यवाद 

©Confused Thoughts

सती कथा -१

भगवान शिव और सती कैलाश पर बैठे हुए हैं, तभी सती देखती है आकाश में कुछ विमान जा रहे हैं-

एक दिन प्रात: भोर बेला में 

कैलाश पर्वत की दुर्गम श्रृंखला में 

शिव – सती शिला पर विराजे हैं 

देख गगन में विमान पंक्तिबद्ध 

बोली सती सहज उत्सुकतावश-

प्रभु एक बार तो देखो गगन को

कभी मन्द कभी तीव्र चलायमान पवन को

विमान की कतारों से खचाखच गगन को 

क्या आज कोई विशिष्ट दिवस है

सर्वज्ञानी मुस्कुराकर बोले 

विमान के ओर दिखाकर बोले 

सभी देव – देवांगनाओं को निमंत्रित किया 

दक्ष ने आज महायज्ञ आयोजित किया है।
कुछ चकित हुए खिसियाकर बोली 

“क्या हमें निमंत्रण नहीं आया?

बताओ प्रभु हमारे पास नहीं है क्या कोई बुलावा?”
शंकर फिर मुस्कुरा कर बोले

सती को समझाकर बोले 

देवी तात तुम्हारे रुष्ट हुए है

देवसभा में मुझसे क्रुद्ध  हुए है 

बैर के सामने ना वे संबंध देखते 

अब मुझ शत्रु को निमंत्रण क्यों भेजते 
सुन वचन प्रभु के स्तब्ध हुई

मगर उत्सव की कल्पनाओं में बद्ध हुई

हे नाथ! मेरे प्रभु प्राणपति

माना क्रूद्ध है आपसे प्रजापति 
किन्तु मैं तो हूं कन्या उनकी

क्यों प्रतिक्षा करूं निमंत्रण की?
महादेव शांत होकर बोले

देवी अब तुम मेरी अर्धांगिनी हो

युगपर्यंत जीवन संगिनी हो

कैलाश तुम्हारा निवास स्थल है

माना दक्ष प्रजापति पिता है तुम्हारे

कनखल मात्र अब जन्म स्थल है

माना पितृ स्नेह चरम है तुम्हारा

मगर पति की आज्ञा धर्म है तुम्हारा

बिना निमंत्रण अगर वहां जाओगी

निश्चित तिरस्कार, अपमान पाओगी।
“प्रभु क्षमा चाहती हूं आपसे

मेरे रात्रि – दिवस घटित होते हैं आपसे।

पति परमेश्वर हो आप मेरे
प्रभु आपके चरणों में भाग्य मेरे

वहां सभी अग्रजा आईं होंगी

नाना सखियां भी बुलवाईं होंगी

अपमान क्षण भर भी ना सह पाऊंगी

अगर घटित हुआ तो वापस लौट आऊंगी

महादेव अंतत: मान गए

गणों के फिर समीप गए

सुनो वीरभद्र तुम आज कनखल जाओगे

अपनी माता को भी साथ ले जाओगे

सुन वचन प्रभु के वीरभद्र गदगद् हो बोले

जो आज्ञा भोले, बोल बम – बम भोले।
देख सती को दक्ष तिरस्कार पूर्ण बोले,

“अपमान मेरा मैं सह ना सकूंगा

देख तुम्हें यूं वनवासी भेष में

चुप एक पल भी मैं रह ना सकूंगा

सुन वचन पिता के सती को आघात हुआ

और मन ही मन पश्चाताप हुआ

महादेव के वचन याद आ रहे थें

कुविचार मन मस्तिष्क को निगले जा रहे थें!

घूंट पी कटू वचनों का सती पहुंची अब यज्ञ स्थल पर

सभी देवों के भाग बने हुए थें

महादेव का ना कोई भाग बना था

स्वयं का अपमान वो सह सकती थी

महादेव का तिरस्कार ना सह सकती थी

ऊंचे स्वर में फिर वह बोली

हे तात यहां क्या खेल बना है

महादेव का भाग क्यों नहीं बना है
फिर दक्ष कुपित होकर बोला

मेरा संबंधी नहीं वो दरिद्र भोला

नाग, भस्म, पेड़ों की छाल धारता है

सुध – बुध नहीं उसे जग की, सारा दिवस भंग मारता है

छवि की उसको सुध नहीं, भूतों का सरकार बनता है

जंगली, दरिद्र कहीं का, हड्ड माला पहनता है
सुन वचन पिता के कंपित हो गई

तिरस्कार से वो क्रुद्धित हो गई
कुछ सूझा नहीं था मन में उसके

लाचार, बेसुध – सी यज्ञ कुण्ड में कुदकर अग्नि को प्रिय हो गई।.

वीरभद्र सब देख चुका था,

क्रोधित हो स्थान से उठा था

अगले क्षण में फरसा धार लिया!

मुण्ड दक्ष का उतार दिया

थे देव सन्न कोई कंपकंपा रहा था

समूचे यज्ञ स्थल पर हाहाकार मचा था!
©Confused Thoughts 

मुझे नहीं पता आपको कैसा लगा ? वैसे फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि ये सिर्फ अपने लिए लिखी है  महादेव की भक्ति का इससे अच्छा मौका नहीं है 

अगर आप पढ़ लेते हैं तो हर हर महादेव जरूर लिखें !

धन्यवाद 

Unconditional 

One day , one night 

Our dreams will be bright 

You and me 

Will make love at sight 

I know it’s just mind creation 

Dreams are real 

 let me give them appreciation.

I know it is just imagination 

Make some memories

Let make their aggregation.

Our future should be like a fiction 

There will be a lot confliction .

Don’t think much about our story 

It will be untraditional 

Do love me and let me love you 

Let’s make it unconditional .

©Confused Thoughts 

Social Links

Hello guys

good after noon all ,

hope you all are doing well

i started blogging in December that time i had never thought that you guys will give your huge support and love .you all are amazing ,every blog have different thought different tone ,i always admire you all even i learned much from you so first of all i would like to say thanks to all of you .WordPress is perfect way to express your feelings and i feel  amazing because i am a member of this beautiful family.daily i meet wonderful personalities even some of them seems like friends,yesterday i joined another blogging platform(one of our fellow blogger posted a blog on it ) ,which is named as IndiBlogger so those who are already on IndiBlogger they can ADD ME or can give their profile link by comments ,

also you can join me on other social sites-

FACEBOOK- ADD ME

INSTAGRAM- FOLLOW ME

TWITTER- FOLLOW

one more thing me and one of my friend have started a small YouTube channel please

visit our channel once

YouTube – VISIT OUR CHANNEL

love you all!!

 

Father 

In whom presence

Your manhood make sense

He never let you feel discomfort

At any moment, in his existance

Always pay for you in any how 

Whatever you do study or do disco dance 
When you find out your lover 

You leave his home forever

Never understand his feelings

But look at him 

He still gives thousands of blessings .
He make sacrifices for your happiness 

Wore the old clothes for your smartness 

He  putted the old boots 

Because of your  expensive suits.

Now look at his kindness . 

©Confused Thoughts

पहल

​कुछ समस्यायें तुम्हारी हैं 

कुछ उलझनें मेरी भी हैं

दोनों एक पग दूर खड़े हैं 

मतभेदों में मजबूर खड़े हैं 

कोई तो रिक्तस्थान भरो

पहल मैं करूं या तुम करो !



दोनों के मन  विचलित हैं 

विचारों में अधिकल्पित हैं

करुण क्रुन्दन सा है अंतर्मन में 

कंपित है तन वियोग के आगमन में

इस विचित्र स्थिति में अब क्या करूँ ?

पहल तुम करो या मैं करूँ !
मिलन की प्रतीक्षा में दोनों नयन आतुर हैं 

अवरोध खड़ा है कठोर मस्तिष्क 

हाय ये बहुत निष्ठुर है 

विरह में व्यतीत हो रहे हैं 

पल पल योजन के जैसे 

मगर कोई पहल करे तो करे कैसे ?

अभी भी स्थिति स्थिर बनी है 

पहल  मैं करूं या तुम करो ! 
©Confused Thoughts