अन्तिम दृश्य  भाग-१

( I am sorry guys if you are English reader because this  story is in Hindi language . but if you are story lover you can copy this on Google translator may be it will show little bit weird translation but I can’t help it thank you ) 


दृश्य –


अस्पताल के एक छोटे  से कमरे में ४ बेड पड़े हुए हैं, उनमें से एक बेड पर शक्ति प्रसाद अचेत – सी अवस्था में जीवन और मृत्यु की लड़ाई बड़ी कठोरता से लड़ रहे हैं। उनके ठीक बगल में उनके छोटे भाई जमुना प्रसाद बहुत गंभीर मुद्रा में कुछ अतीत के साये में घिरे हुए , कुर्सी पर सतर्क बैठे हुए हैं ! कुछ पिछले वर्षों की यादें आज भी उनकी आखों में तार रही हैं। एक समय हुआ करता था जब गांव में शक्ति प्रसाद बड़े रौब से घूमा करते थे। बचपन की खिलायी पिलायी थी और कुछ पुराने जमाने के अनाज का असर था, कि शक्ति प्रसाद का कद यही कुछ ६ फुट के करीब होगा और छाती योद्धा जैसी विशाल थी, गांव में जब भी कहीं रिश्ता और कबड्डी होती तो वहां उनका उपस्थित होना , अनिवार्य – सा हो चला था, क्योंकि खेल के सभी नियम  सिर्फ उन्हें ही आते थें, यहां तक कि ६५ साल की उम्र में भी २१ साल के नौजवानों को धोबी पाट मारने में समय नहीं लगाते थे ! दूर दूर के गावों में उनकी क्षमता की निकाल दी जाती थी, ढ़ाई मन अनाज कंधे पर ऐसे रख लाते थे मानो कोई फूंस – सी हल्की चीज ला रहे हो!


सुबह ४ बजे उठना और नित्य कर्म से निवृत्त होकर , स्नानादि के बाद सीधे गांव के बाहर वाले मन्दिर पर भगवान शिव की उपासना करना, ये दिनचर्या में शुमार था! गर्मी का प्रकोप हो या सर्दी की सुन्नी वाली ठण्ड मगर शक्तिप्रसाद की दिनचर्या टस से मस नहीं हो सकती ! यही कारण था कि उनका शरीर आज भी गठा हुआ , हृष्टपुष्ट था और नौजवानों जैसी चमक आज भी उनके चेहरे पर थी ! उनकी मॉं का देहान्त बचपन में ही हो गया था तो रिश्तेदार बोले “इसका विवाह करा चारों भाइयों और बाप को खाना नसीब हो जायेगा”, इसलिए मात्र १६ वर्ष की अवस्था में १४ वर्ष की मधुमति से इनका विवाह करा दिया था, मधुमति की उम्र काफी कम थी और वो अपनी पांच बहनों में सबसे छोटी थी, इसलिए बचपन से ही बड़े लाड़ – प्यार से पाली गयी थी। मगर ससुराल की परिस्थितियों को समझते हुए, उन्होंने इतनी बड़ी गृहस्थी की जिम्मेदारी बखूबी निभाई। शक्ति भाइयों में बड़े थे, बाकि छोटे तीनों को पढ़ाने के लिए खूब धूप – दौड़ की, मगर कभी किसी पर अहसान जाहिर नहीं किया। आज तीनों भाई सरकारी नौकर हैं और अपने परिवार के साथ खुशहाल अलग अलग शहरों में रहते हैं।


वो कहते हैं ना , “कर्मवान के लिए काम बहुत और निठ्ल्लों के लिए आराम बहुत “।


अब भाइयों के बाद बच्चे बड़े हो चले थे , बड़ा लड़का सुधीर आज बैंक में क्लर्क है और छोटे दो लडके क्रमशः अजीत, विनोद इंजीनियरिंग करने  गये थें और वहीं इंजीनियर बनकर रह गये। और अब मेहमान की भांति कभी – कभी आते हैं और चले जाते हैं। वो कहते हैं ना मां – बाप की ममता ऐसी होती है कि २-४ दिन उनके लिए उत्सव की तरह होते थें। मां मधुमति, उन्हें पता नहीं क्या – क्या बनाकर खिलाती। एक पल विश्राम करना तो दूर की बात है, वो नहीं चाहतीं कि कोई भी पकवान छूट जाये और शक्तिप्रसाद भी व्यंग में बोलते “हां भई! अब हमें कौन पूछेगा? आखिर दोनों लाड़ले जो आ गये हैं”। 


फिर मधुमति झल्लाकर बोलती – “आपको बड़ी जलन होती है, एक तो कभी – कभी  आते हैं ये! उसमें भी तुम्हारी पूछ करूं? जाओ अपना काम करो।”


और शक्तिप्रसाद मुस्कुराते हुए चले जाते। वो कहते हैं ना मां की ममता जाहिर होती है और बाप कभी अपने प्यार को कठोर स्वभाव के सामने जाहिर नहीं होने देते। आज भी वो अपने बेटों को बच्चों की तरह फटकार देते थे।


बड़ा बेटा पास के शहर में नौकरी करता था और घर से आना – जाना हो जाता था। मां का प्यार तो सबके लिए समान होता है। सुबह – सुबह पराठे बांध कर उसके लिए रख देती थी। मगर बाप के लिए कोई नया जैसा नहीं था, क्योंकि वो बचपन से ही घर पर रहा। पढ़ाई – लिखाई सब यहीं नजदीक शहर में हुई, साथ में खेती में हाथ बंटाता था। फिर क्लर्क की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद पद पर कार्यरत है।


सुधीर का स्वभाव कोमल था, चपलता तो जैसे उससे क्यों दूर थी, रंग गोरा मगर शरीर बाप के मुकाबले कहीं नहीं था। अब पहाड़ के सामने पत्थर की क्या औकात!


बचपन में बाप ने बेटों पर ज्यादा बोझ ना डालते हुए पढ़ाई का विशेष ध्यान रखा था, क्योंकि खुद तो कुछ पढ़ नहीं पाये थे। माता का निधन, उसके बाद घर का बोझा, फिर कम उम्र में शादी! जीवन के सारे पड़ाव उन्होंने देखे थे। सावन, बरसात, धूप, कभी सर्दी देखते – देखते आज बाल सफेद हो गये। वो कहते हैं ना सफेद बाल तजुर्बे में हुए हैं, ठीक उसी का नतीजा था, जो गांव के छुटमुट फैसले, विवाद निपटाने लोग शक्तिप्रसाद के पास आ जाते थें और कभी निराश नहीं जाते थें। धार्मिक स्वभाव के चलते चंदा के लिए अनाज देने के लिए उनके दरवाजे हमेशा खुले रहते थें। मगर सुख के दिन कम और दुख के दिन घने होते हैं ……


……आगे पढ़ें अगले भाग में 

भाग-१

भाग-२

भाग-३

भाग-4

भाग -५

भाग-६



अगला भाग आपकी आज्ञा पर प्रकाशित होगा। आप अपनी प्रतिक्रियाएं दें, ताकि मुझे अगला भाग लिखने की प्रेरणा मिले!

धन्यवाद 

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10 thoughts on “अन्तिम दृश्य  भाग-१

    1. बहुत बहुत धन्यवाद! अगर मुझे एक भी प्रतिक्रिया मिली है तो अब मैं पूरे मन के साथ अगला भाग लिखने का प्रयास करूंगा !

      Liked by 1 person

    1. सबका राज खुलेगा बस इंतेजार करिये 😋😋 अगला भाग मेरे विचारों पर निर्भर करेगा , मगर जल्द ही लिखूंगा और मैं साथ की साथ पब्लिश भी कर दूंगा !
      हमेशा की मेरी रचनायें पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏

      Liked by 1 person

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