रंग_ए_चमन -२

 खुदगर्जी का आलम फिर इस कदर छाया

एक भाई ने दूसरे भाई का हिस्सा खाया

अब खौफ फैल चुका था पूरे वतन में 

अब जिन्दगानियों पर रहता था संगीन का साया!


रंग_ए_चमन की खुशबू कहीं काफूर हो गयी 

इन्सानियत की तस्वीरें अब                  

अपने ही घर पर चकनाचूर हो गयी 

कौमें भी अपने अलग नशे में चूर हो गयीं

रंग_ए_चमन की खुशबू कहीं काफूर हो गयी 


बाज के पांव अब सटीक लगे हैं 

नजर_ए_बाद का साये में 

काले बादल अब जहां पर छाने लगे हैं 

नासमझों की बातें बेवकूफाना होती हैं 

मगर तजुर्बेकार भी साजिशों में लगे हैं!


शरम_ओ_हया सब दांव पर लगी फिर

इज्जत की बोली बाजारों में लगी फिर 

अबलाओं की इज्जत भी

भरे बाजारों में लुटी फिर !!


इन्सान की हैवानियत का किस्सा 

आपको क्या सुनाऊं साहब!

दरिंदगी की इंतेहां अब क्या बताऊं साहब 

जब इन्सानियत का हर रोज खून हो 

किस्से बुजदिली के क्या छुपाऊं साहब!

जब आदमी की कौम अब जानवर बन चुकी है 

तो फख्र आदमी होने का क्या जताऊं साहब!


औरत की आबरू खेल बनी फिर 

लोगों की वहां भीड लगी फिर 

मर्द बहुत थे मौका_ए_वारदात पर 

मुठ्टी भर दरिंदे लगाये थे बेचारी को घात पर

 मर्दानगी पर जंग लगी फिर !


मुहल्ले की फिजायें अब बिगड गयीं हैं 

हवायें भी रूख से पलट गयी हैं 

रंग_ए_चमन की हरी भरी बगिया

बाज की चाल से उजड गयी हैं

हिन्द अभी जिन्दा है दुनिया में 

मगर तहजीबें अब उखड सी गयी हैं !


©Confused Thoughts

(जैसा कि मैंने अपनी पिछली कविता में लिखा था कि अगला भाग आपकी राय के बाद प्रकाशित होगा मगर भूलवश मुझे कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली थी मगर फिर भी मुझे आज इसका अगला भाग लिखना पडा क्योंकि विचारों के वेगों को कोई शक्ति रोक नहीं सकती मैं तो फिर भी तुच्छ सा प्राणी हूं !)










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