मानवता का पतन

​मानवता का पतन


किसी ने बोला जान की कीमतें खूब घटी हैं


बड़े अफसोस की बात है साहब 


मेरे देश में जान से ज्यादा आबरू लुटी है


मुझे  एक क्षण विश्वास नहीं होता था ऐसी बातों पर 


मगर ऐसी घटनायें यहां खूब घटी हैं!
एक रोज सुबह मुझसे कोई आकर बोला 


मैंने झटपट अखबार खोला 


मुंह लाल पड़ गया खबरें पढ़कर 


फिर मन ही मन खूब बोला!



मन में इतनी आग भरी थी


अब वो घटना आंखों में हरी – भरी थी


हैवानों की हैवानियत तो समझ आती है मगर 


वो भीड में इंसानियत क्यों चुपचाप खड़ी थी!

चलो माना दरिंदों की संख्या अधिक थी 


मगर इतनी भीड़ क्या वहां आंख सेंकने खड़ी थी 


शर्म नहीं आती तुम्हें अपने आपको देखकर 


तुम्हारी मानवता क्या कहीं गिरवी पड़ी थी ! 

एक बार हिम्मत जुटाकर तो देखते


अपने जज्बात जगाकर तो देखते


एक प्रहार तो करते दरिंदों पर


कुछ और भी आ जाते देखते – देखते! 



सुकून से रहते हो अपने घर में 


तुम्हे क्यों ये सब ख्याल आयेगा 


वक्त पलटने में समय नहीं लगता दोस्त 


आज नहीं कल तुम्हारा भी वक्त आयेगा 
जब तुम ही आगे नहीं बढ़ते कभी 


तो तुम्हारी मदद में अब कोई क्यों आयेगा ?



https://youtu.be/0NshNKKH0-k

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