अंत्येष्टि 

ढोल नगाडों से स्वागत हुआ था ,

मीठे भोगों से आवाभगत किया था!

मां ने  सारा सुख परित्याग किया था,

जब उस नन्हे से जीव ने जन्म लिया था ||

फिर गली मौहल्ले  नापकर चला वो ,

उठता सम्हलता कभी दौडता चला वो !

कभी सुख  तो कभी दुख में चला वो ,

जिन्दगी के पथ पर बढता चला वो !

कंधों पर लिए जिम्मेदारी का बोझा ,

अपने जीवन की गाडी को हांकता चला वो||




कभी बारिश में भीगा तो कभी तूफानों लडा था,

कभी खेतों की खातिर तपती दुपहरी में खडा था!

कभी औरों की मोल ली लडाई में लडा था ,

कभी अपनों की खातिर चट्टान सा खडा था||


सारी जिन्दगी में क्या क्या रंग देखे थे उसने ,

कुदरत के बनाये सब खेल खेले थे उसने !

सब दुख दर्द खुद ठेले थे उसने ,

क्योंकि सारे मौसम देखे थे उसने ||


समय का चक्र तेजी से गुजरता गया था,

वो जिन्दगी की लडाई लडता गया था!

अब चलने से कुछ लडखडा गया था,

जाने क्यों वो अब उखड सा गया था||




फिर घिर गया वो बीमारी के घेरे में,

वक्त गुजरता अब हकीम के खेमे में!

कुछ अपने लगे थे देखभाली में उसके,

कुछ अपने लगे उसे औषधी देने में||

अब राम नाम वो पुकारने लगा था,

सत्य को वो पहचानने लगा था!

मृत्युं की घडी अब निकट है मेरे,

इस सार्थक सत्य को  मानने लगा था||




कुछ भेजे थे यम ने दूत पृथ्वी पर,

जो आये बडे मदमस्त होकर!

 खींचे प्राण कुछ कठोर होकर,

फिर चल दिये वो परलोक को !

उस प्राणी के प्राणों को लेकर ||


अब शरीर धरती पर अचेत पडा है,

कुछ अन्दर ही अन्दर अकडा पडा है!

अब लोगों का जमावाडा लगा पडा है,

कोई शरीर के निकट तो कोई दूर खडा है||




शरीर को रख लकडियों के घर में ,

निकली ध्वनि फिर एक स्वर में !

राम नाम सत्य है , सत्य बोलो गत्य है||

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14 thoughts on “अंत्येष्टि 

    1. कभी कभी भावनायें सब प्रदर्शित कर देती हैं
      शब्द तो सिर्फ माध्यम मात्र होते हैं 😊
      धन्यवाद मैम

      Liked by 1 person

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