प्रतिशोध की घडी

​ध्वज को तुम थाम लो,

शस्त्र तुम निकाल लो !

मिट्टी को बना मुकुट ,

मस्तकों पे धार लो !

प्रतिशोध की घड़ी है,

अब ये बात मन में ठान लो ||



जा युद्ध का आह्वान कर,

शत्रु को हैरान कर !

गूंज उठे शब्द  गगन में ,

ऐसा तू गुंजाल कर !

प्रतिशोध की घडी है ये 

आज बात मन में गाढ लो ||



कुछ वीरों का ध्यान कर ,

कुछ भागवत का सार पढ,

कुछ भाव ला क्रोध के!

आज अशोक को तू याद कर ,

यही घडी मिली है प्रतिशोध की!

आज बात मन में ठान ले||



युद्ध के लिए उठा ध्वजा ,

ढोल को आज जोर से बजा!

रथ को तू वधु जैसा सजा ,

जा शत्रुओं को दे सजा !

यही घडी है प्रतिशोध की,

आज मन में ठान ले||




आज ह्रदय को तू निकाल कर,

बाजुओं को ढाल कर,

तिलक लगा तू भाल पर !

रूप को विकराल कर ,

प्रतिशोध की घड़ी है अब !

आज निकल तू ये ठान कर||




युद्ध का आरम्भ कर ,

कुछ स्थिति प्रचंड़ कर !

देव को प्रणाम कर ,

धनुष पर तू बाण धर!

प्रतिशोध का आरम्भ कर ,

आज ह्रदय को बांध कर||




तरकश को तू धार ले ,

तलवार को साध ले !

लपट उठा दे रणभूमि में ,

कुछ ऐसा प्रमाण दे !

प्रतिशोध की अग्नि है ये ,

इसे वायु से विराट कर ||




आज वीर का प्रमाण दे ,

वीरता उभार दे !

यही घडी प्रतिशोध की ,

अब प्रेम को बिसार दे !

शत्रुओं के मस्तकों को ,

कृपाण से उतार दे ||
शत्रु को ललकार कर :-

“आ धूर्त मुझसे युद्ध कर ,

शक्ति है कितनी तुझमें ?

आ शौर्य को प्रदर्श कर !

तेरे रक्त को लालायित हूं ,

आ मुझे तू तृप्त कर ||


एक बार तो मुठभेड कर ,

आज तुझे कुछ ज्ञान दूंगा !

दो दो हाथ तो कर मुझसे ,

यहीं भूमि में गाढ दूंगा !

इतिहास की हस्ती क्या है ?

आज तेरा भूगोल बदल दूंगा !

प्रतिशोध की घड़ी है आज ,

सब अस्त व्यस्त कर दूंगा||

आज वायु को नया मोड दूंगा ,

सब वर्जनायें तोड़ दूंगा!

उतार मुंड धड़ तेरे,

हाथ पैर जोड दूंगा ||”



महाकाल का तू ध्यान धर ,

तांड़व सा तू नृत्य कर !

हाथ मैं त्रिशुल धर ,

सिर शत्रु के उतार धर !

आज तू ये पाप कर ,

मन में मृत्युंजय जाप कर !

प्रतिशोध की घड़ी है ये ,

मन में तू ना शोक कर ||




जन जन की पुकार है ,

राज्य में हाहाकार है!

शत्रु मस्तक पर सवार है,

अब युद्ध की गुहार है !

धनुष अब तू धार ले ,

प्रत्यंचा अब तू चढा ले !

तेरे कहर का शिकार होने,

वहां शत्रुओं की कतार हैं!

पराक्रम का प्रचार कर ,

पूर्वजों का मान रख!

ये प्रतिशोध की गुहार है||




विजय तेरे करीब है ,

शत्रु नेता करीब है !

जा इसे तू ललकार दे ,

गगन तक दहाड़ दे !

पल भर भी ना विचार कर,

मस्तक इसका उतार दे !

सिहर उठे भू हाहाकार से ,

शत्रुओं को नृशंस्य ताड़ दे!

प्रतिशोध की ज्वाला है ये ,

अब विजय से तू तार दे||



युद्ध अब विराम है,

शत्रु अब परेशान है !

सेना के साथ जो उछल रहा था ,

उसका धड भूमि पर पडा सुनसान है !

विलाप रहे हैं परिजन सबके ,

युद्ध भूमि में शोर घमासान है ||



जा विजय का आह्वान कर ,

पर नारियों का सम्मान कर !

कुछ मात्रभूमि पर गुमान कर ,

प्रतिशोध अब पूरा हुआ |

कुछ पल तो अब आराम कर|| 

© Confused Thoughts

कविता पढने के बाद प्रतिक्रिया अवश्य दें आपकी प्रतिक्रिया मुझे प्रेरित करती है !

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20 thoughts on “प्रतिशोध की घडी

    1. सर कद से भी अधिक सम्मान देने के लिए धन्यवाद ! अगर मेरी से कविता कोई सैनिक भाई पढेगा तब जाकर कविता सफल होगी

      Liked by 1 person

  1. यह जानकर अच्छा लगा आज के नन्हे युवा भी हिंदी की इतनी प्रतिभावान डोर को संभाले हैं। साधुवाद आपको नन्हे कवि

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    1. मुझे लेखन का बहुत कम अनुभव है पिछले २० दिनों से लिखना प्रारम्भ किया था और कविता तो मैने प्रयोग के लिए लिखी थी क्योंकि वीर रस की कवितायें सबसे ज्यादा प्रिय थीं स्कूल के समय पर तो सोचा मैं भी लिखकर देखता हूं 😂

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      1. बीस दिनों में 100 फॉलोवर्स काबिले तारीफ में साल भर में मात्र 300 लोल .. मेरे लिये भी लिख दिया करो दोस्त 😊 💐💐 बहुत सुंदर आशा करती हूँ यूँही लिखते रहोगे । खूब पढ़ो और आगे बढ़ो

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      2. उसके लिए प्रशंसा का पात्र नहीं हूं मैं क्योंकि मैं नया था तो मैंने ज्यादा से ज्यादा ब्लाग पढने के लिए लोगों को फॉलो किया बस उनमें से बहुत लोगों ने फालो बैक किया 😂

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  2. क्या पता जंगे आजादी की लड़ाई में कितनों की बलि चढ़ गई,
    आज के भारतीय को क्या पता कितनों की गोद उजड़ गई।

    कितनों के उजड़े सुहाग और कितनों के घर उजड़ गए,
    आज का भारतीय बस अपनी मस्ती में मस्त है।

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    1. बहुत सुन्दर ! मगर मेरा आशय किसी वर्तमान युद्ध के लिए नहीं था मेरा आशय उत्साहवर्धन से था

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