पहलू

वो आज हमारे पास आकर कठोर स्वर में बोले,

“तुम खुद को समझते क्या हो?

नहीं करनी अब मुझे कोई वार्तालाप तुमसे!

अब नहीं करूंगी छिपकर मिलाप तुमसे!”
हमसे रुष्ट हुए अभी कुछ पल ही गुजरे थें,

एक व्यंग्य हमें भी सुझा और हम बोले,

“नाराज रहने से हम रिश्तों को खोते हैं।

पहले बात को समझिए – हर बात के दो पहलू होते हैं।”
कुछ नाराजगी भी चरम पर थी उनकी,

वो तपाक से हम पर पलटकर बोले,

“तुम्हारी बातें मेरे लिए अब व्यर्थ जैसी हैं,

क्योंकि तुम्हारी सारी गलतियां खुद मैंने अपनी आंखों से देखी हैं।

अब तुम कह भी कैसे सकते हो- हर बात के दो पहलू होते हैं!”
अब दुविधा बड़ी आन पड़ी थी,

फिर हम कुछ सोचकर बोले-

” कुछ त्रुटियां हमसे भूलवश हुईं थीं,

तो कुछ आपने बदले में की थीं।

मैं मानता हूं आपके मस्तिष्क में अब मेरे लिए विरोध होते हैं।

मगर वार्तालाप से मुद्दा सुलझ सकता है।

आपको हमसे बात करने में क्या अवरोध होते हैं?

मैं फिर से कहूंगा- हर बात के दो पहलू होते हैं!”

अब वो कुछ शांत होकर बोले-

“तुम्हारा निवेदन कभी अस्वीकार नहीं कर सकती

और दोबारा तुमसे वार्तालाप की तो

रिश्ते से इंकार नहीं कर सकती।

ये तुम्हारे सारे उपाय मुझे पहले से ज्ञात होते हैं।

सब कुछ जानकर भी अज्ञान बन जाती हूं,

बिना बात किए मैं खुद परेशान हो जाती हूं।

अपनी बातों में मधुर विष घोले हो,

हर बार की भांति तुम शब्दों से खेले हो! 

तुम्हारे शब्द मेरे लिए कुछ मायावी – से होते हैं,

ठीक ही कहते हो- हर बात के दो पहलू होते हैं!”
अब ये सब सुनकर मैं कुछ मुस्कुराया और बचाव में बोला,

“एक पहलू तुम्हारा सही था,

एक पहलू मेरा भी सही था 

और एक है हमारा तालमेल,

जिसमें दोनों सही होते हैं।

इसलिए पगली! दो नहीं, बात के तो तीन पहलू होते हैं!

 ए क तुच्छ सा प्रयास है आपकी राय की चाहूंगा ! आपके विचार मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं 

आपका – शिवा
©Confused Thought

Email – shubhankarsharma428@gmail.com

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